अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर व्यय के मामले में भारत काफी पीछे

वर्ष 2018 में भारत ने अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर 1.5 अरब डालर व्यय किया, अमरीका से 13 गुणा, चीन से 7 गुणा कम

बेंगलूरु.

अंतरिक्ष तकनीक और क्षमता में भले ही भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने विकसित देशों की बराबरी कर ली है लेकिन अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर व्यय के मामले में अभी भी अमरीका, चीन अथवा रूस से काफी पीछे है।वर्ष 2019-20 के आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि वर्ष 2018 में भारत ने अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर 1.5 अरब डालर व्यय किया। लेकिन, यह अमरीका की तुलना में लगभग 13 गुणा और चीन की तुलना में लगभग 7 गुणा कम है। हाल के कुछ वर्षों के दौरान अंतरिक्ष कार्यक्रमों में चीन एक प्रमुख देश के तौर पर उभरा है। अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने वर्ष 2018 के दौरान 19.5 अरब डॉलर जबकि चीनी अंतरिक्ष एजेंसी (सीएनएसए) ने 11 अरब डॉलर खर्च किए। इनके अलावा रुसी अंतरिक्ष एजेंसी (रॉसकॉसमॉस) ने इस दौरान 3.3 अरब डॉलर खर्च किए।

उपग्रह लांचिंग में भी काफी पीछे

आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि वर्ष 2018 में भारत ने 7 उपग्रह लांच किए जबकि रूस ने 20, अमरीका ने 31 और चीन ने 39 उपग्रह लांच किए। भारत पिछले कुछ वर्षों से हर वर्ष 5-7 उपग्रह लांच कर रहा है। साल 2017 के एक उपग्रह लांचिंग में मिली विफलता को छोड़कर पिछले कुछ वर्षों में उपग्रह लांच करने में भारत को कोई नाकामी नहीं मिली। सर्वे में कहा गया है कि इसरो अंतरिक्ष कार्यक्रमों और उत्पादों को आम आदमी तक पहुंचाने के लिए निजी उद्योगों को बढ़ावा दे रहा है। विशेष रूप से उपग्रहों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए प्रक्षेपण, उपग्रहों के निर्माण और अनुप्रयोगों में भी निजी उद्योगों को शामिल किया जा रहा है। निजी क्षेत्र को पीएसएलवी के उत्पादन, उपग्रहों के इंटीग्रेशन एवं एसेंबलिंग, कम्पोजिट सामग्री के उत्पादन, ठोस, तरल और क्रायोजेनिक तथा सेमी-क्रायोजेनिक प्रणोदकों के उत्पादन के अलावा उपग्रहों की उप-प्रणालियों एवं एवियोनिक्स के लिए इलेक्ट्रोनिक पैकेजों के उत्पादन, परीक्षण और मूल्यांकन की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है।

अंतरिक्ष के अधिकांश उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों का मुख्य फोकस इनसैट/जीसैट संचार उपग्रहों पर है जो दूर संचार सेवाओं, प्रसारण, उपग्रह आधारित ब्राडबैंड सेवाओं के लिए रीढ़ की हड्डी है। इसके बाद भू-अवलोकन उपग्रहों को प्रमुखता दी जा रही है जो अंतरिक्ष आधारित सूचना और मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन, राष्ट्रीय संसाधनों के मानचित्रण तथा गवर्नेंस के लिए आवश्यक है। तीसरी प्रमुखता उपग्रह आधारित नेविगेशन (गगन और नाविक प्रणाली) सेवाएं हैं। रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ वर्षों के दौरान अंतरिक्ष गतिविधियों में व्यापक बदलाव आया है। अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में दूसरे देश और एजेंसियां भी उभरकर सामने आई हैं। राष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसियां अंतरिक्ष अन्वेषण और राष्ट्रीय जरूरतों के हिसाब से काम कर रही हैं जबकि निजी क्षेत्र वाणिज्यिक जरूरतें पूरी कर रहे हैं। अधिकांश देश अंतरिक्ष का उपयोग राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से कर रहे हैं। वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था वर्ष 2018 में लगभग 360 अरब डॉलर तक पहुंच गई।

Rajeev Mishra Reporting
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