बच्चों को दी अरिहंत व आठ कर्मों की जानकारी

बच्चों को दी अरिहंत व आठ कर्मों की जानकारी

Ram Naresh Gautam | Publish: Sep, 04 2018 06:16:07 PM (IST) Bengaluru, Karnataka, India

सभाध्यक्ष बंशीलाल पितलिया, ज्ञानशाला समिति के राकेश दुधेडिय़ा, महिला मंडल की प्रेमबाई भंसाली ने विचार व्यक्त किए

बेंगलूरु. विजयनगर अर्हम भवन में साध्वी मधुस्मिता आदि ठाणा 6 के सान्निध्य में ज्ञानशाला दिवस मनाया गया। बच्चों के महामंत्र मंगलाचरण के बाद साध्वी ने बच्चों को अरिहंत एवं आठ कर्मों के बारे में जानकारी दी। सभाध्यक्ष बंशीलाल पितलिया, ज्ञानशाला समिति के राकेश दुधेडिय़ा, महिला मंडल की प्रेमबाई भंसाली ने विचार व्यक्त किए। ज्ञानशाला के बच्चों की प्रतिक्रमण एवं पच्चीस बोल की परीक्षा ली गई। फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में बच्चों ने आकर्षक प्रस्तुति दी। मधु कटारिया ने ज्ञानशाला के बारे में जानकारी दी।


सांसारिक सुख क्षणिक
बेंगलूरु. जिन कुशल सूरी जैन आराधना भवन बसवनगुड़ी में साध्वी प्रियरंजनाश्री ने कहा कि अरिहंत परमात्मा ने 4 घाती कर्म का नाश करके करुणा भव से भरकर प्राणी मात्र के कल्याण के लिए देशना दी। उन्होंने कहा कि महात्माओं ने बताया कि परमात्मा के सामने कभी भी सांसारिक एवं भौतिक सुखों की प्रार्थना नहीं करनी चाहिए। सांसारिक एवं भौतिक सुख क्षणिक हैं। क्षण भंगुर है, विनाशी है, जबकि परमात्मा से मोक्ष सुख मांगना चाहिए जो कि शाश्वत है जिसे कोई छीन नहीं सकता। चुरा नहीं सकता, जो सुख पराधीन नहीं है बल्कि हमारे स्वयं के हाथ में स्वतंत्र है।

आज कृष्ण जन्माष्टमी है। कृष्ण ने मोक्ष सुख पाने के लिए कितने प्रयास किए, लेकिन उसके जीवन को देखे सारा जीवन कष्टमय था। फिर भी उन्का जीवन कितना पवित्र था। जन्म लिया तो जेल में, बचपन बीता तो यादवों के घर, ग्वालों के घर, जवानी बीति गोपियों के साथ बाकी का समय युद्ध में, मृत्यु हुई तो जंगल में। उस समय कोई उनके पास भी नहीं था। यह उस महान पुरुष का जीवन था लेकिन फिर भी उन्होंने अपने जीवन को बोझ नहीं माना।

ज्ञान रूपी दीप प्रज्वलित करने वाले थे मिश्रीमल
बेंगलूरु. वर्धमान स्थानकवासी जैन संघ फ्रेजर टाउन में साध्वी निधि ज्योति ने कहा कि प्राणी जन्म मरण के दुष्चक्र में फंसकर काल कलवित हो जाते हैं, किंतु कुछ विरल आत्माएं इस धरा पर जन्म लेकर स्व एवं पर कल्याण के लिए अपने जीवन को न्यौछावर कर इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर अपने नाम अंकित कर जाती हंै। जिसने समाज में व्याप्त अज्ञान रुपी अंधकार को चीर कर सम्यक ज्ञान रूपी दीप जनमानस में प्रज्ज्वलित किया ऐसे श्रमण दिनकर युग दृष्टा जन की आस्था केंद्र थे मरुधर केसरी मिश्रीमल, जिन्होंने करीब 180 से अधिक रचनाएं दी। उन्होंने कहा कि सभी को अपने प्राण प्रिय हैं, चाहे कोई एकन्द्रिय, कोई पचेन्द्रि, तिर्यंच या मनुष्य हो कोई मरना नहीं चाहता। सभी के प्राण समान हैं।

Ad Block is Banned