छोटे कणों से बने तरल एरोसोल में नाइट्रेट की प्रधानता

एशिया के आसमान में बादल की तरह जमी परतें, 16 से 17 किमी ऊंचाई पर छाए हैं एरोसोल, इसरो-नासा कर रहे संयुक्त रूप से अध्ययन

By: Rajeev Mishra

Published: 13 Mar 2018, 07:04 PM IST

बेंगलूरु.
एशिया के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में क्षोभमंडल से समताप मंडल के बीच जमी रहस्यमयी एरोसोल की गहन परतों की गुत्थी सुलझाने में लगे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और नासा के वैज्ञानिकों को कई नई जानकारियां मिली हैं। एरोसोल के भौतिक, रासायनिक एवं विकिरण गुणों का अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिक इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि यह तरल है और इसका गठन बेहद सूक्ष्म कणों से हुआ है। यह एरोसोल जलवायु और मौसम को प्रभावित करने वाले अहम कारक हैं।
दरअसल, इसरो और नासा ने गत वर्ष संयुक्त रुपए से अध्ययन किया था जिसमें यह पता चला कि धरती से 16-17 किलोमीटर की ऊंचाई पर क्षोभमंडल से समताप मंडल तक एरोसोल फैले हुए हैं। उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों में यह परत नजर आने के बाद बाद दोनों अंतरिक्ष एजेंसियों ने मॉनसून काल में अध्ययन किया था। अब हाल ही में फिर एक बार दोनों अंतरिक्ष एजेंसियों ने जाड़े के मौसम में इसका अध्ययन किया। ताजा परिणामों के अनुसार यह स्पष्ट हो गया है कि यह एशियाई आसमान में छाए एरोसोल ०.२५ माइक्रोन आकार के कणों से बने तरल (80-95 फीसदी) पदार्थ हैं। इसमें नाइट्रेट की मात्रा काफी अधिक है और इसकी सांद्रता 100 नैनोग्राम प्रति घन मीटर है। इस परिणाम से वैज्ञानिक हैरान हैं क्योंकि एरोसोल में सल्फेट की मौजूदगी के कोई प्रमाण नहीं मिले। दरअसल, एशिया से हो रहे बड़े पैमाने पर सल्फर उत्सर्जन को देखते हुए यह माना जा रहा था कि संवहनीय हवाओं के जरिए ये तत्व उपरी क्षोभमंडल और निचले समतापमंडल तक पहुंच जाते हैं जहां अपने विषम रासायनिक गुणों से एक पतले बादल की परत का रूप ले लेते हैं। वैज्ञानिकों को पूरा विश्वास था कि इसमें सल्फेट की मात्रा होगी लेकिन सल्फेट नहीं होने से अब इसके अध्ययन के नए आयाम खुल गए हैं। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि एशियाई आसमान पर एरोसोल परत के गठन की असली वजह क्या है। क्या यह प्राकृतिक रूप से हो रहा है या धरती से प्रदूषक तत्व इतनी ऊंचाई तक पहुंच रहे हैं। मॉनसून और जाड़े के बाद ग्रीष्मकालीन मौसम में भी इस तरह के प्रयोग किए जाएंगे।
इसरो की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार एशियाई ट्रोपोपॉज एयरोसोल लेयर के अध्ययन के लिए बैलून आधारित माप अभियान में 35 वैज्ञानिकों की टीम लगी थी। इसमें राष्ट्रीय वायुमंडलीय अनुसंधान प्रयोगशाला (एनएआरएल), नासा (अमरीका), सीएनआरएस (फ्रांस), हैदराबाद स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटर रिसर्च (टीआईएफआर) तथा बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) और हैदराबाद विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक भी शामिल हुए। वैज्ञानिकों ने एरोसोल परत के भौतिक, रासायनिक एवं विकिरण गुणों का अध्ययन किया। इसके लिए वैज्ञानिक उपकरणों से युक्त बैलून छोड़े गए साथ ही उपग्रहों और शक्तिशाली एमएसटी राडार व लिडार के जरिए भी आंकड़े जुटाए गए। वैज्ञानिकों का कहना है कि क्षोभमंडल की ऊंचाई पर जमे एरोसोल धरती की ऊर्जा, समताप मंडल में ओजोन और जलवायु पर व्यापक प्रभाव डालतेे हैं। यह चिंता का विषय है क्योंकि प्रदूषणकारी गैसों से निर्मित एरोसोल निचली समताप मंडल के ओजोन परतों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

 

Rajeev Mishra Reporting
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