scriptISRO successfully demonstrates IAD, a game changer technology | शुक्र और मंगल ग्रह पर लैंडिंग तकनीक का सफल परीक्षण | Patrika News

शुक्र और मंगल ग्रह पर लैंडिंग तकनीक का सफल परीक्षण

साउंडिंग रॉकेट लांच कर इसरो ने किया अहम परीक्षण
रॉकेट चरणों को भी पुन: हासिल करने में मिलेगी सफलता

बैंगलोर

Published: September 09, 2022 02:18:06 pm

बेंगलूरु.
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने शुक्र और मंगल ग्रह पर सुरक्षित लैंडिंग के लिए आवश्यक तकनीक का सफल परीक्षण किया है। उपग्रहों के किफायती प्रक्षेपण के दृष्टिकोण से भी यह तकनीक काफी महत्वपूर्ण है। इस तकनीक का उपयोग कर प्रक्षेपणयानों (रॉकेट) के पुन: उपयोग में लाए जाने वाले चरणों (हिस्से) को धरती पर सुरक्षित वापस लाया जा सकेगा।
दरअसल, यह धरती या किसी ग्रह के वातावरण में मुक्त रूप से गिरते किसी वस्तु (रॉकेट के चरण, वैज्ञानिक उपकरण अथवा विभिन्न प्रकार के पे-लोड) को वायुगतिकी अवत्वरण (एयरोडायनामिक डीसेलेरेशन) के जरिए नियंत्रित गति से उतारने और सुरक्षित लैंडिंग कराने की तकनीक है। इसरो के अंतरग्रहीय मिशनों जैसे मंगल और शुक्र के वातावरण में प्रवेश एवं सुरक्षित लैंडिंग, रॉकेट चरणों को पुन: प्राप्त करने और मानव अंतरिक्ष मिशनों में अंतरिक्ष आवास बनाने में इस तकनीक के व्यापक उपयोग की संभावना है।
शुक्र और मंगल ग्रह पर लैंडिंग तकनीक का सफल परीक्षण
शुक्र और मंगल ग्रह पर लैंडिंग तकनीक का सफल परीक्षण
वीएसएससी ने किया विकसित
इसरो ने इस अहम तकनीक का परीक्षण रोहिणी साउंडिंग रॉकेट (आरएच-300) से इनफ्लेटेबल एयरोडायनामिक डीसेलेरेटर (आइएडी) का प्रक्षेपण कर किया। आइएडी की डिजाइनिंग और विकास विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) ने किया। यह केवलर फैब्रिक्स से बना है और इस्पात से भी कई गुणा अधिक मजबूत, बुलेट पू्रफ और कई खूबियों वाला है। इसे बैलून की तरह फूलाया जा सकता है।
रॉकेट में मोडक़र रखा आइएडी
तकनीक के परीक्षण के लिए आइएडी को मोडक़र रोहिणी-300 रॉकेट के नोजकोन (शंकु के आकार वाला रॉकेट का अग्रभाग) में पे-लोड के साथ रखा गया। इसे 15 लीटर के छोटे से खंड में रखने की सुविधा है। रोहिणी रॉकेट के नोजकोन में इसे रखने के लिए पर्याप्त स्थान है, जहां अमूमन पे-लोड रखे जाते हैं। आइएडी को फुलाने के लिए 62 बार दबाव के साथ कम्प्रेस्ड (संपीडित) नाइट्रोजन गैस की बोतल भी पैक कर दी गई और उसे पायरो वाल्व से जोड़ दिया गया।
84 किमी की ऊंचाई से वापसी
थुम्बा इक्वेटोरियल लांचिंग स्टेशन (टीईआरएल) से प्रक्षेपण के 110 सेकेंड बाद रोहिणी रॉकेट ने लगभग 84 किमी की ऊंचाई हासिल की। इस ऊंचाई पर आइएडी रॉकेट से अलग हो गया। रॉकेट से अलग होते ही पायरो प्रणाली में हल्का विस्फोट हुआ और आइएडी में नाइट्रोजन गैस भरने लगा। फूलने के बाद आइएडी की आंतरिक मात्रा 236 लीटर और दबाव 1.1 बार हो गया।
नियंत्रण के साथ सुरक्षित लैंडिंग
प्रक्षेपण के 200 सेकेंड बाद एफएलएससी (लचीला एक रेखीय धागा) अलगाव प्रणाली के जरिए पे-लोड मोटर से अलग हो गया। इसके बाद पे-लोड और फूला हुआ आइएडी धरती के वातावरण में नियंत्रित तरीके से उतरने लगे। आइएडी ने वायुगतिकी खिंचाव के जरिए पे-लोड के वेग को क्रमानुसार कम किया और पूर्व निर्धारित पथ का अनुसरण करते हुए सुरक्षित लैंडिंग सुनिश्चत किया। इसरो के तीन राडारों ने उसे ट्रैक किया। समुद्र में उतरने के बाद आइएडी की हवा निकाल ली गई।
नई तकनीकों का प्रयोग
इसरो ने कहा है कि यह पहला अवसर था जब आइएडी की डिजाइनिंग विशेष रूप से प्रक्षेपण यान के किसी चरण को पुन: धरती पर वापस लाने को ध्यान में रखकर की गई। इस मिशन के सभी उद्देश्यों में शत-प्रतिशत सफलता हासिल हुई। रोहिणी साउंडिंग रॉकेट का प्रयोग विभिन्न तकनीकों के परीक्षण में इसरो करता रहा है। इस बार के प्रक्षेपण में कई नई तकनीकों को आजमाया गया। माइक्रो इमेजिंग सिस्टम का भी प्रयोग किया गया। दो कैमरे भी भेजे गए थे जिसने आइएडी के फूलने और उड़ान भरने की प्रक्रिया के साथ पूरे मिशन का जीवंत प्रसारण किया।
भविष्य की तकनीक
इसरो अध्यक्ष एस.सोमनाथ ने कहा कि इस परीक्षण से आइएडी तकनीक का उपयोग कर कम लागत में रॉकेट चरण की रिकवरी का मार्ग प्रशस्त हुआ है। इसरो इस तकनीक का प्रयोग भविष्य के शुक्र और मंगल मिशनों में भी करेगा।

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