जिनवाणी से बदलता है दृष्टिकोण: डॉ. समकित मुनि

बताई लोगस्स पाठ की महिमा

By: Santosh kumar Pandey

Published: 07 Sep 2020, 09:37 PM IST

बेंगलूरु. अशोकनगर शूले में विराजित श्रमण संघीय डॉ.समकित मुनि ने लोगस्स पाठ की महिमा, गरिमा बताते हुए कहा कि जिनेंद्र वह होते हैं जो हमें स्वयं को जीतने की कला में उस्ताद बनाते हैं। तीर्थंकर आंख नहीं बदलते, देखने का तरीका बदल देते हैं। तीर्थंकर इतना ही उपदेश देते हैं कि जिन हाथों से धक्का दिया जाता है उन्हें हाथों से किसी को संभाला भी जा सकता है। जिनेंद्र की वाणी हमारा दृष्टिकोण बदलती है।

मुनि ने कहा कि लोगस्स का पाठ स्वयं को चार्ज करने का पाठ है। तीर्थंकर की ऊर्जा से जुडऩे का माध्यम है लोगस्स की साधना। दुनिया को जीत कर लोग खाली रह जाते हैं, स्वयं को जीतने वाला मालामाल हो जाता है। जिन की स्तुति स्वयं को जितना सिखाती है। लोगस्स के पाठ में वह सामथ्र्य है जो हमें संकटों से बचा सकता है।

चेलना की कथा सुनाते हुए मुनि ने कहा कि जिंदगी की नाव पार लगाने वाला दयामय धर्म एकमात्र धर्म है। मन- वचन- काया को वश में करना, जीवों की दया पालना कोई आसान काम नहीं, वीरता का काम है। शिक्षा देने का अधिकारी वह होता है जिसके जीवन में त्याग वैराग्य हो। रागी और भोगी किसी को सद् शिक्षा नहीं दे सकता। जिसके जीवन में दया है वही महान होता है।
प्रसार-प्रचार मंत्री प्रेम कुमार कोठारी ने बताया कि संचालन संघ के मंत्री मनोहरलाल बंब ने किया।

Santosh kumar Pandey Desk
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