दूसरों के गुणों को परखें और प्रशंसा करें

पाश्र्व सुशील धाम में आचार्य देवेंद्रसागर ने प्रवचन में कहा कि स्नेह देना, स्नेह लेना, और स्नेह से ही सामने वाले का प्रेम अर्थात स्नेह संपादित करना, यह हमें मालूम है। परंतु हम इसे अपने आचरण में लाने का प्रयत्न नहीं करते।

बेंगलूरु. पाश्र्व सुशील धाम में आचार्य देवेंद्रसागर ने प्रवचन में कहा कि स्नेह देना, स्नेह लेना, और स्नेह से ही सामने वाले का प्रेम अर्थात स्नेह संपादित करना, यह हमें मालूम है। परंतु हम इसे अपने आचरण में लाने का प्रयत्न नहीं करते। यदि हम इसका अर्थ समझकर दैनंदिन जीवन में इसे अपना लें तो निश्चित ही जीवन सफल होगा। प्रेम-भावना से व्यवहार करके हम जीवन में जरूर सफल होंगे। सामने वाले व्यक्ति पर प्रेम, आदर, अपनापन, जैसी भावनाओं को उड़ेलते रहेंगे, तो हमें निश्चित ही लाभ होगा।

उन्होंने कहा कि ऐसी भावनाओं के लिए हमें भी अपना बर्ताव शुद्ध, सात्विक, निराभिमानी बनाना जरूरी है। दूसरों के गुणों को परखें तथा उनकी प्रशंसा करें। गुणों की प्रशंसा करने से, वह व्यक्ति निश्चित ही हमारा अपनत्व समझेगा, और उससे हमारे संबंध प्रगाढ़ होंगे।

साथ ही एक सद्भावना पनपेगी। आज इस स्नेह के अभाव से ही घरों में, कार्यालयों में समाज में सौहार्द का वातावरण समाप्त हो रहा है।
घर में माता-पिता, बच्चे, सास-बहू यदि आपस में इन भावनाओं के साथ समझदारी से रहने का प्रयत्न करें तो आनंद से रह सकेंगे।

Santosh kumar Pandey Desk
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