कंगारू मदर केयर से बच सकती हैं कई जिंदगियां

कंगारू देखभाल, तय समय से पहले जन्म लेने वाले या अपरिपक्व शिशुओं की देखभाल का एक कारगर तरीका है और ऐसे शिशु के विकास में काफी मददगार है। कंगारू देखभाल करना ठीक वैसा ही है जैसे कंगारू अपने बच्चे को बाहरी खतरों से सुरक्षित रखने के लिए उसे पेट की थैली में रखता है। इस विधि में भी मां अपने शिशु को कंगारू की तरह अपने सीने व त्वचा से चिपकाकर रखती हैं और इसी स्थिति में उसे स्तनपान भी कराती है। इस विधि का असल मकसद शिशु को अपने शरीर की गर्मी देना होता है।

- शिशु मृत्यु दर में कमी, लेकिन काफी कुछ करना बाकी
- हर वर्ष करीब 10 हजार नवजातों की मौत
- 25 प्रतिशत मृत्यु बर्थ एस्फिक्सिया के कारण

बेंगलूरु.

बीते एक दशक में प्रदेश में शिशु मृत्यु दर (Infant Mortality Rate) में गिरावट आई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के अनुसार कर्नाटक में शिशु मृत्यु दर 27 प्रति 1000 जीवित जन्म है। जबकि वर्ष 2005-06 में 43 थी। अब भी इन मौतों को कम किया जा सकता है। कंगारू मदर केयर (kangaroo mother care) व अन्य विधियों से हजारों नवजात की जान बच सकती है। हजार में से 29 बच्चों की तो दस्त से मौत हो जाती है। प्रदेश में हर वर्ष करीब 10 हजार नवजात की मौत होती है। गत पांच वर्ष में 57,656 नवजात मरे हैं। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में 3200 से ज्यादा नवजात की मौत हो चुकी है। इनमें से ज्यादातर मौतें सरकारी अस्पतालों में हुई हैं। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के आयुक्त पंकज कुमार पांडे ने बताया कि मृत्यु दर को और कम करने के प्रयास जारी हैं।

एक से दूसरे अस्पताल भेजने में देरी
इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ (आइजीआइसीएच) के निदेशक डॉ. संजय केएस ने बताया कि बाल मरीज को एक से दूसरे अस्पताल भेजने में देरी बाल मृत्यु दर के बड़े कारणों में एक है। कर्नाटक ही नहीं आंध्र प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक के गंभीर बाल मरीजों का यहां उपचार होता है। आइजीआइसीएच में वर्ष 2018-19 में करीब 200 नवजात की मौत हुई। जो गत चार वर्ष के मुकाबले 20 फीसदी कम है।

उपचार सुविधाओं की कमी

इंडियन अकैडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (Indian Academy of Pediatrics) के अनुसार भी बीमारी व संक्रमण की पहचान और विशेषज्ञों तक पहुंचने में देरी बाल मृत्यु दर का बड़ा कारण है। क्षेत्रीय स्तर पर उपचार सुविधाओं की कमी है।

संस्थागत प्रसव की सलाह

आइजीआइसीएच की पूर्व निदेशक और तुमकूरु जिला अस्पताल में बाल रोग विभाग की मौजूदा प्रोफेसर डॉ. आशा बेनकप्पा के अनुसार शिशु मृत्यु दर से निपटने में निमोनिया, पेट संक्रमण, दस्त, समय पूर्व जन्म, जन्म के दौरान कम वजन, हृदय व गुर्दा संबंधी बीमारियां बड़ी चुनौती हैं। कई मामलों में अभिभावक भी शिशु को अस्पताल लाने में देरी कर देते हैं। प्रसव में देरी भी मौत का एक कारण है। कुल नवजात की मौतों में करीब 20-25 प्रतिशत मृत्यु बर्थ एस्फिक्सिया (जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी से दम घुटने) के कारण होती है। जन्म के समय ऑक्सीजन की कमी से दम घुटने से बच्चे को गंभीर स्वास्थ्य समस्या हो सकती है। गंभीर हालातों में बच्चे की जान भी जा सकती है। इसलिए गृह प्रसव की जगह संस्थागत प्रसव की सलाह दी जाती है। कुछ चिकित्सकों के अनुसार 2.5 किलो से कम वजन के शिशु का विशेष इकाई में उपचार होता है। इस दौरान शिशु को हाइपोथर्मिया होने की संभावना ज्यादा रहती है। ऐसी स्थिति में लाइट थेरेपी से उपचार होता है, लेकिन प्रदेश के ज्यादातर सरकारी मैटरनिटी होम्स में इसकी कमी है।

अंतिम समय में कैसे बचे जान

नाम नहीं छापने की शर्त पर स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि कई निजी अस्पताल गंभीर रूप से बीमार बच्चों को सरकारी अस्पतालों में भेज देते हैं। निजी अस्पतालों में अभिभावकों को दिन के हिसाब से उपचार शुल्क का भुगतान करना होता है। आइसीयू काफी महंगा होता है। शिशु के स्वास्थ्य में सुधार का अंदेशा न हो या फिर अभिभावक के पैसे खत्म हो रहे हों तो ज्यादातर अस्पताल ऐसे मरीजों को सरकारी अस्पताल रेफर करते हैं। अंतिम समय में ऐसे शिशु का बचाना मुश्किल हो जाता है।

Nikhil Kumar Reporting
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