कोरम के अभाव में सत्र के आखिरी दिन 77 मिनट की देरी से शुरू हुई कार्यवाही

विधानसभा का हाल ...

बेंगलूरु. विधानमंडल के बजट अधिवेशन का पांच दिवसीय पहला चरण शुक्रवार को खत्म हो गया लेकिन आखिरी निचले सदन की कार्यवाही कोरम के अभाव और मंत्रियों की गैरहाजिरी के कारण समय पर शुरू नहीं हो पाई। हाल के कुछ सत्रों में सदस्यों की कम उपस्थिति के कारण कोरम की समस्या पहले भी हो चुकी है लेकिन शुक्रवार को स्थिति ज्यादा गंभीर रही। सदन में नियमों के मुताबिक कार्यवाही शुरु करने के लिए २४ माननीय सदस्य भी उपस्थित नहीं थे जिसके कारण कार्यवाही 77 मिनट की देरी से शुरु हुई। सदन में सदस्यों को लाने के लिए सरकार के मुख्य सचेतक और दूसरे अधिकारियों को काफी मशक्कत करनी पड़ी। मंत्रियों की गैरहाजिरी पर सभी दलों के नेताओं ने नाराजगी जताई।
विधायी सदनों के कामकाज संचालन नियमावली के मुताबिक कार्यवाही संचालन के लिए कम से कम 10 फीसदी सदस्यों की सदन में उपस्थिति जरुरी है। एक मनोनीत सदस्य सहित 225 सदस्यीय विधान सभा में कोरम की शर्त को पूरा करने के लिए कम से कम २५ सदस्यों की मौजदूगी अनिवार्य है। शुक्रवार को सदन की कार्यवाही सुबह 10 बजे शुरु होनी थी लेकिन न्यूनतम संख्या में सदस्यों के नहीं होने के कारण कार्यवाही ११.१७ बजे तक शुरु हो पाई जब सदन में माननीयों की संख्या 25 हो गई। इस दौरान लगातार कोरम के लिए घंटी बजती रही। सुबह दस बजे मंत्री रमेश कुमार, रामलिंगा रेड्डी, कागोडु तिमप्पा, कृष्णा बेरेगौड़ा के अलावा विधायक के.जी. बोपय्या तथा अभयचन्द्र जैन ही समय पर पहुंचे। इनके अलावा विपक्षी दलों के नेता सहित कोई भी विधायक मौजूद नहीं था।
विधानसभा की कार्यवाही शुरु होते ही विपक्ष के नेता जगदीश शेट्टर ने मध्याह्न भोजन कर्मचारियों की हड़ताल का मसला उठाते हुए सरकार से जवाब मांगा। शेट्टर ने कहा कि हम इस मसले पर शिक्षा मंत्री का बयान चाहते हैं लेकिन वे ना तो सदन में हैं और ना ही प्रदर्शन स्थल पर ही गए हैं। सत्ता पक्ष की खाली पड़ी प्रथम पंक्ति की ओर इशारा करते हुए शेट्टर के मंत्रियों की गैर हाजिरी का मसला उठाने पर उपाध्यक्ष शिवशंकर रेड्डी ने उन मंत्रियों के नाम की सूची पढ़ी जिन्होंने शुक्रवार को सदन से अनुपस्थित रखने के लिए अनुमति मांगी थी। इसके बाद शेट्टर ने कहा कि सात मंत्री सदन से गैर हाजिर रहने की अनुमति ले चुके हैं फिर सत्र चलाने का क्या औचित्य है? क्या कोई जिम्मेदारी नहीं है। शेट्टर ने आसन से जानना चाहा कि इन मंत्रियों को अनुपस्थित रहने की अनुमति किस आधार पर दी गई है। वे किसी सरकारी कार्य से दौरे पर हैं अथवा निजी कार्य में व्यस्त हैं। शेट्टर ने कहा कि हमारे पास की कई व्यक्तिगत कार्य हैं। करीब दो महीने बाद होने वाले चुनाव के कारण मौजूदा विधान सभा का यह आखिरी अधिवेशन है।
बजट अधिवेशन 16 से
5 फरवरी को संयुक्त अधिवेशन में राज्यपाल के संबोधन के साथ विधानमंडल का अधिवेशन शुरु हुआ था। शुक्रवार को पांच दिवसीय पहला चरण पूरा हो गया जबकि एक सप्ताह के अवकाश के बाद 16 फरवरी से दूसरा चरण होगा। 16 फरवरी को ही मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या अपनी सरकार का बजट पेश करेंगे। हालांकि, यह सिर्फ रस्म अदायगी बजट ही होगा लेकिन सरकार को चुनाव से पहले लोकलुभावनी घोषणाएं करने का मौका मिल जाएगा। चुनाव के बाद सत्ता में आने वाली सरकार मर्ई-जून में फि से बजट पेश करेगी।
विधायिका की पवित्रता नहीं समझने वाले नेता जिम्मेदार
स्वास्थ्य मंत्री के.आर. रमेश कुमार ने शेट्टर की बात का समर्थन करते हुए इस बात पर चिंता जताई कि दोनों ही पक्षों के सदस्यों की उपस्थिति कम है।
उन्होंने कहा कि इतने देर तक सदन की कार्यवाही शुरु करने के लिए कोरम का इंतजार करना पड़ा। अगर 25 सदस्य भी उपस्थित नहीं हो तो यह अच्छी स्थिति नहीं है...यह काफी असंतोषजनक है। इसी बीच, उपाध्यक्ष रेड्डी ने कहा कि सदस्यों को गंभीर और जिम्मेदार होना चाहिए। रमेश कुमार ने कहा कि इतनी कम उपस्थिति के बावजूद क्या सिर्फ कोरम पूरा होने के कारण तकनीकी आधार पर कार्यवाही जारी रखना सही है। रमेश कुमार ने सरकार और विधायिका के बीच लकीर खिंचने की कोशिश करते हुए कहा कि कम उपस्थिति के लिए सिर्फ सरकार को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। हर सदस्य और मंत्री इस सदन और मतदाताओं के प्रति जवाबदेह है। रमेश ने सदस्यों में सदन के उपस्थिति को लेकर गंभीरता के अभाव पर चिंता जताते हुए कहा कि उन्हें सदन की पवित्रता और गरिमा को समझते हुए अपनी जिम्मेदारी का अहसास होना चाहिए। रमेश कुमार ने कहा कि इस तरह की स्थिति को देखकर बहुत ही दुख होता है। राजनीतिक इच्छा शक्ति नहीं रखने वाले विधायकों के नेता बनने से राज्य की हालत क्या होगी। रमेश कुमार ने कहा कि वे पिछले 40 सालों से विधानसभा में रहे हैं पर उन्होंने ऐसी हालत कभी नहीं देखी। सदन के प्रति गंभीरता ही खत्म हो जाने पर मर्यादा क्या रह जाएगी और लोगों की स्थिति क्या होगी?
पाबंद करने की नौबत
90 के दशक में विधानसभा अध्यक्ष रहे कुमार ने ऐसी स्थिति से निपटने के अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा कि लगता है अब सदस्यों को सदन में आने के लिए पाबंद करने की स्थिति बन गई है। उन्होंने कहा कि अध्यक्ष के तौर पर वे उपस्थिति पंजी पर हस्ताक्ष कर चले जाने वाले सदस्यों को बुलाकर कहते थे कि सदन में आने के बाद वे उनके अभिभावक हैं और अगर वे इस तरह बाहर चले जाते हैं और उन्हें कुछ होता है तो वे इसके लिए जिम्मेदार माने जाएंगे। लिहाजा वे सदन में रहें।

कुमार जीवेन्द्र झा Incharge
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