कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग व जांच में कई जिले पीछे

- मानव संसाधन, प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी आड़े

By: Nikhil Kumar

Updated: 16 Dec 2020, 10:52 PM IST

बेंगलूरु. राज्य में बीते एक माह में कोविड से मृत ज्यादातर मरीजों को सबसे पहले सिवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी इंफेक्शन (एसएआरआइ) या इन्फ्लूएंजा लाइक इलनेस यानी आइएलआइ के लक्षणों के साथ भर्ती किया गया था। बाद में वे कोविड पॉजिटिव निकले। लेकिन बेंगलूरु शहरी व ग्रामीण सहित 10 जिले ऐसे मरीजों की पहचान व जांच में पीछे हैं। लक्ष्य का 23 फीसदी ही हासिल कर सके हैं। प्रदेश स्वास्थ्य विभाग ने 30 सितंबर को अधिसूचना जारी कर एसएआरआइ और आइएलआइ के लक्षण वाले सभी लोगों की कोविड जांच अनिवार्य कर दी थी। जांच के अभाव में ऐसे मरीज बाद में पॉजिटिव निकल रहे थे।

पॉजिटिव मरीजों के संपर्क में आए लोगों की पहचान व जांच में भी कई स्तर पर खामियां हैं। बेंगलूरु शहरी, बेंगलूरु ग्रामीण, बीदर, दक्षिण कन्नड़, बेलगावी, विजयपुर, उडुुपी, हावेरी, बल्लारी और यादगीर जिले में 30 नवंबर से नौ दिसंबर तक 2.9 लाख कॉन्टैक्ट्स की कोविड जांच होनी थी। लेकिन 50 हजार यानी 17 फीसदी कॉन्टैक्ट्स को ही जांचा जा सका।

इन जिलों में आइएलआइ और एसएआरआइ सहित 49,688 सिंप्टोमेटिक मरीजों की टेस्टिंग होनी थी। इनमें से 11,232 लोगों की ही जांच हो सकी।

ऐसे में कई पॉजिटिव मरीजों के छूटने की संभावनाएं हैं। पॉजिटिव मरीजों के संपर्क में आए लोगों की जांच में कुछ जिलों का प्रदर्शन सराहनीय है लेकिन सिंप्टोमेटिक लोगों को जांचने में ये जिले पीछे हैं।

उदाहरण के लिए बीदर जिले में 81 फीसदी कॉन्टैक्ट्स की जाचं हुई जबकि चार फीसदी सिंप्टोमेटिक लोग ही जांचे जा सके। इसी तरह यादगीर जिले में 131 फीसदी कॉन्टैक्ट्स की जांच हुई लेकिन 10 फीसदी सिंप्टोमेटिक लोगों की ही कोविड टेस्टिंग हो सकी।

बेंगलूरु में मामला विपरीत है। 65 फीसदी सिंप्टोमेटिक लोगों की तुलना में 15 फीसदी कॉन्टैक्ट्स ही जांचे जा सके हैं।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, कर्नाटक की निदेशक अरुंधति चंद्रशेखर ने इस स्थिति के लिए लोगों को भी जिम्मेदार ठहराया है। उनके अनुसार टेस्टिंग आसान कार्य नहीं है। सभी कॉन्टैक्ट्स जांच में सहयोग नहीं करते हैं। स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी के अनुसार कई लोग जांच के बिना ही निजी चिकित्सकों से लक्षणों का उपचार करा रहे हैं।

प्रदेश कोविड-19 तकनीकी सलाहकार समिति के सदस्य डॉ. गिरिधर आर. बाबू ने कहा कि सभी कॉन्टैक्ट्स को जांचना संभव नहीं है। मानव संसाधन व प्रतिशित कर्मचारियों की कमी भी समस्या है। जिला स्तरीय समीक्षा में भी कई स्तर पर चुनौतियां हैं।
कोविड वॉर रूम के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 1.9 फीसदी मरीज ही सिंप्टोमेटिक हैं।

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Nikhil Kumar Reporting
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