बच्चों को स्कूल खींच लाई शिक्षक की 'पेंसिल'

कभी इस स्कूल से दूर रहने वाले बच्चे आज छुट्टी के बाद भी स्कूल छोड़ने का नाम नहीं लेते हैं। ड्रॉपआउट दर 90 फीसदी तक घटी है।

By: Nikhil Kumar

Updated: 05 Sep 2020, 11:53 AM IST

- 90 फीसदी घटी ड्रॉपआउट दर
- रायचुर के इस सरकारी स्कूल के बच्चे अब खुद लिख रहे अपनी तकदीर
- शिक्षक दिवस विशेष

निखिल कुमार

बेंगलूरु. सरकारी स्कूल के एक शिक्षक की 'पेंसिल' (PENCIL) बच्चों को स्कूल खींच लाई है। अभिभावक भी शिक्षा की ताकत और जरूरत को स्वीकारने लगे हैं। शिक्षा विभाग के अधिकारियों को भी समझ में आ गया कि स्कूल में मूलभूत और ढांचागत सुविधाएं कितनी जरूरी हैं। इसी का नतीजा है कि कभी इस स्कूल से दूर रहने वाले बच्चे आज छुट्टी के बाद भी स्कूल छोड़ने का नाम नहीं लेते हैं। कभी छोटी सी जगह में नाममात्र के दो जर्जर और एस्बेस्टस शीट वाले दो कमरों में संचालित स्कूल में आज 300 से ज्यादा बच्चे, नौ शिक्षक और नौ कमरे हैं। एक एकड़ में फैले इस सरकारी स्कूल में 40 से ज्यादा विशाल वृक्ष हैं। बड़े-बुजुर्ग सुबह की सैर के लिए आते हैं। आसपास की हरियाली, शांत वातावरण के बीच खूबसूरत नजारे और पक्षियों की चहचहाहट मंत्रमुग्ध कर देती है। स्कूल के कायाकल्प के पीछे है कर्नाटक के बल्लारी जिले के 39 वर्षीय शिक्षक कोटरेश बी. (Kotresha B) के 16 वर्षों की कड़ी मेहनत, लगन और दृढ़ संकल्प।

छोड़ना चाहता थे नौकरी, मां ने समझाया

बकौल कोटरेश, पढ़ाई सरकारी स्कूल में हुई। वर्ष 2004 में रायचुर जिले में सिंद्धनुर तालुक स्थित बेलगुर्की सरकारी स्कूल में शिक्षक की नौकरी लगी। पहुंचते ही स्कूल की हालत देखकर दंग रह गया। 200 में से करीब 60 बच्चे ही स्कूल आते थे। तबादले की अपील हर बार नामंजूर हो गई। निराश होकर घर लौट गया। लेकिन मां ने हौसला बढ़ाया और बच्चों की खातिर लौटने पर मजबूर कर दिया। स्कूल और बच्चों का विकास लक्ष्य बन गया। रायचुर में प्रचंड गर्मी पड़ती है। बच्चे कक्षा में बैठ नहीं पाते थे। इसलिए वे स्कूल के बाहर एक विशाल वृक्ष की छाया में पढ़ाने लगे। मीडिया में खबरें आने के बाद शिक्षा विभाग के कुछ अधिकारियों ने नाराजगी जताई लेकिन दो कक्षाओं के निर्माण के लिए फंड भी जारी किया। इसके बाद भी फंड जारी हुए लेकिन स्कूल के विस्तार के लिए जगह नहीं थी। खुद के पैसे सहित स्थानीय लोगों से फंड जुटा उन्होंने एक किसान से स्कूल के पास स्थिति एक एकड़ जमीन खरीदी जिसका पंजीकरण सरकार के नाम पर हुआ।

बाल विवाह, बाल श्रम और गरीबी के बीच ऐसे पड़ी नींव

कोटरेश ने बताया कि इन प्रयासों के बावजूद ड्रॉपआउट दर नहीं घटी। शिक्षकों की कमी, जल संकट, शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी, बाल विवाह, बाल श्रम और गरीबी (lack of skilled teachers, water shortage, lack of awareness towards education, child marriage, child labor and poverty)आदि भी इसके जिम्मेदार थे। बच्चों को स्कूल तक लाने के लिए कोटरेश घर-घर जा माता-पिता को शिक्षा का महत्व समझाते। कोटरेश ने यह भी देखा की बच्चों के लिए स्कूल में कोई आकर्षण नहीं था। लेकिन बच्चे चित्रकारी आदि में रुचि रखते थे। यहीं से वर्ष 2013 में चार पृष्ठों की 'पेंसिल' नामक स्कूल मैगजीन की शुरुआत हुई जो अब रायचुर के इस गांव के घर-घर का हिस्सा है।

ट्रायल एंड एरर जरूरी

कोटरेश के अनुसार पेंसिल ट्रायल एंड एरर (परिक्षण और त्रुटी) का प्रतिक है। गलती होने पर पेंसिल का लिखा मिटा सकते हैं। बच्चों के सीखने की प्रक्रिया भी ट्रायल एंड एरर जैसी होती है। इसलिए उन्होंने मैगजीन का नाम पेंसिल रखा। बच्चे मैगजीन के लिए दोहा, कविता, कहानी आदि लिखने लगे। कई बच्चों को कार्टूनिंग में दिलचस्पी थी।

बच्चे खुद पर और अभिभावक बच्चों पर गर्व करने लगे

कोटरेश खुद लेआउट डिजाइन करते और हर माह मैगजीन की 500 प्रतियां छपवाते हैं, जिन्हें गांव के पाठकों में नि:शुल्क बांटा जाता है। इसमें हर माह करीब 4000 रुपए का खर्च आता है, जो वे खुद के जेब से देते हैं। मैगजीन में नाम के साथ खुद की खबरें आदि देख बच्चे नियमित रूप से स्कूल आने लगे और अधिकांश बच्चों का ज्यादातर समय स्कूल में ही गुजरने लगा। मैगजीन से जुड़े होने पर बच्चे खुद पर और अभिभावक बच्चों पर गर्व करने लगे।

बच्चे सामाजिक मुद्दों सहित उत्सव और त्यौहार आदि पर भी लिखने लगे। गांव के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने लगे। जो कुछ भी देखते और महसूस करते, उसे शब्दों में पिरोने लगे। बीते कुछ वर्षों में बच्चों के सोचने और बोलने के तरीकों में बदलावा आया है। आत्मविश्वास बढ़ा है। पेंसिल अब सामुदायिक पत्रिका बन चुकी है। प्रशिक्षण के बाद कक्षा पांच से आठ के 10 विद्यार्थी संपादन कार्य संभाल रहे हैं।

खबर का जरिया भी

लोगों के लिए 'पेंसिल' खबर का जरिया भी है क्योंकि यहां अब तक कोई नियमित अखबार नहीं पहुंचता है। ड्रॉपआउट (School Dropout Rate Decreased by 90 percent) दर 90 फीसदी तक घटी है।

बच्चों ने रुकवाया तबादला

10 वर्ष की नौकरी के बाद शिक्षा विभाग ने अगले तीन वर्षों के लिए कोटरेश को बतौर कलस्टर रिसोर्स पर्सन (समूह संसाधन समन्वयक) नियुक्त किया। कंधों पर आसपास के 30 स्कूलों की देखरेख की जिम्मेदारी थी। कार्यकाल समाप्त होते ही बच्चों और ग्रामीणों को उनके तबादले की भनक लगी तो सभी विरोध पर उतर आए। शिक्षा विभाग को फैसला बदलना पड़ा।

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Nikhil Kumar Reporting
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