कर्नाटक : लो डोज रेडिएशन थेरेपी से होगा कोविड मरीजों का उपचार!

  • आठ दशक पुरानी तकनीक का परीक्षण

By: Nikhil Kumar

Updated: 28 May 2021, 09:53 AM IST

- बेंगलूरु में जल्द शुरू होगा नैदानिक परीक्षण
- जब एंटीबॉयोटिक नहीं थे तब होता था निमोनिया का उपचार

बेंगलूरु. कोरोना मरीजों के उपचार के लिए आठ दशक पुरानी तकनीक का परीक्षण किया जाएगा। लो डोज रेडिएशन थेरेपी (एलडीआरटी) का उपयोग पहले निमोनिया (Pneumonia) के इलाज के लिए होता था। अब इसका उपयोग कोरोना के गंभीर मरीजों के लिए किया जाने पर अध्ययन चल रहा है।

कोरोना के उपचार में कारगर है या नहीं और एलडीआरटी (Low Dose Radiation Therapy) के जरिए कोविड मरीजों में निमोनिया के प्रभाव को कम किया जा सकता है या नहीं, इस पर शहर के एचसीजी कैंसर अस्पताल में जल्द ही क्लिनिकल परीक्षण शुरु होगा। लेकिन, यह उपचार केवल उन मरीजों के लिए लक्षित है जो पहले से ही ऑक्सीजन सपोर्ट पर हैं और अल्पावधि में वेंटिलेटर की जरुरत हो सकती है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) इस पर शोध कर चुका है। गत वर्ष जून से अगस्त तक किए गए इस शोध में 10 मरीजों को शामिल किया गया। 10 में से नौ मरीज थेरेपी के तीन से सात दिनों में स्वस्थ हो गए जबकि एक मरीज की मौत हो गई। मरीज को पहले से उच्च रक्तचाप की शिकायत थी। 1940 के दशक में जब एंटीबॉयोटिक दवाएं उपलब्ध नहीं थी, तब निमोनिया के उपचार में रेडिएशन थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता था।

एचसीजी अस्पताल में रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्टि डॉ. लोहित रेड्डी ने बताया कि कुछ सप्ताह में परीक्षण शुरू करने की योजना है। भारत सहित विदेशों में इस पर तीन अध्ययन हो चुके हैं। एलडीआरटी फायदेमंद साबित हुई। आम तौर पर कैंसर के उपचार के लिए रेडिएशन थेरेपी की हाई डोज दी जाती है। लेकिन, कोविड मरीजों को लो डोज दी जाएगी। वर्ष 1900 की शुरुआत में स्पैनिश फ्लू के दौरान भी निमोनिया के इलाज के लिए रेडियोथेरेपी व एक्स-रे का इस्तेमाल हुआ था। हम प्रतिरक्षा प्रणाली को सुधारने का प्रयास करेंगे। परीक्षण केवल उन मरीजों के लिए होगा जिन्हें ऑक्सीजन सपोर्ट या मेकैनिकल वेंटिलेशन की जरुरत है।

डॉ. रेड्डी ने बताया कि जब मरीज (Cytokine storm) साइटोकाइन स्टॉर्म (जहां शरीर केवल वायरस से लडऩे के बजाय अपनी कोशिकाओं और ऊतकों पर हमला करना शुरू कर देता है) से गुजर रहा होता है तब फेफड़ों को नुकसान पहुंचता है। इसके कारण तीव्र श्वसन संकट सिंड्रोम होता है। इस साइटोकाइन स्टॉम से पहले रेडियोथेरेपी का उपयोग किया जाएगा। प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने में मदद मिलेगी।

अभी तक के अध्ययन परिणामों से पता चला है कि एलडीआरटी तब देनी चाहिए जब मरीज की ऑक्सीजन पर निर्भरता बढऩे लगे। इससे ऑक्सीजन पर निर्भरता घटेगी और मरीज के जल्दी ठीक होने की संभावनाएं बढ़ेंगी।

कोविड-19 तकनीकी सलाहकार समिति के सदस्य डॉ. सी. एन. मंजूनाथ ने बताया कि एलडीआरटी का उपचार प्रोटोकॉल का हिस्सा बनाने से पहले ज्यादा से ज्यादा क्लिनिकल ट्रायल डेटा की जरूरत है। जो नतीजे आएंगे, उसका विश्लेषण किया जाएगा। अगर रेडिएशन थेरेपी को कोरोना वायरस के इलाज में प्रभावी पाया गया तो आगे काम किया जाएगा।

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Nikhil Kumar Reporting
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