जानिए 23 साल पहले सूर्यग्रहण पर राजस्थान में हुए वैज्ञानिकों के जमघट के बारे में

...तब पत्रिका में पढ़ी खबर और उमड़ पड़े लोग

By: Ram Naresh Gautam

Updated: 24 Jul 2018, 04:59 PM IST

बेंगलूरु. भारतीय ताराभौतिकी संस्थान के प्रोफेसर (सेनि) रमेश कपूर ने बताया कि जब भी हमने पूर्ण ग्रहण का नजारा किया वह खूबसूरत और यादगार बन गया। खासकर 16 फरवरी 1980 और 24 अक्टूबर 1995 का पूर्ण सूर्यग्रहण विशेष यादें छोड़ गया। वर्ष 1995 के सूर्यग्रहण के समय भारतीय ताराभौतिकी संस्थान का कैम्प राजस्थान के एक छोटे से शहर नीम का थाना में लगाया गया।

लेकिन, कैम्प लगते ही हलचल तेज हो गई। हजारों लोग कैम्प में आए और हमसे ग्रहण से जुड़े बहुत सारे सवाल पूछने लगे। वे हमें छू-कर देखते थे जैसे खुद को कुछ यकीन दिलाना चाहते हों। कारण यह था कि तब राजस्थान पत्रिका में भारतीय ताराभौतिकी संस्थान के कैम्प के बारे में एक खबर छपी थी। उसी का असर था उस दिन 'नीम का थानाÓ में हजारों की संख्या में पुरुष, महिलाएं, युवा, बच्चे, छात्र लगभग हर वय के लोग वहां आए। खासकर ग्रहण के दिन बहुत बड़ी संख्या में लोग कैम्प में पहुंचे। संस्थान ने शोध कार्य पूरे किए जिसमें विदेशी वैज्ञानिक भी शामिल हुए। हमने राजस्थान पत्रिका का प्रभाव भी देखा। वह ग्रहण यादगार रहा।

 

चंद्रग्रहण बड़ी और सूर्य ग्रहण छोटी अवधि के

नेहरू तारामंडल मुंबई (वर्ली) के पूर्व निदेशक पीयूष पाण्डेय ने बताया कि सूर्यग्रहण बहुत छोटी अवधि के होते हैं। अगर जेट विमान से इसका पीछा करें तो उसे बढ़ा सकते हैं। यह अधिकतम 7 मिनट के हो सकते हैं। चूंकि, चांद छोटा है इसलिए उसकी एक छोटी छाया बनती है जो पृथ्वी पर चलती रहती है। वहीं पृथ्वी की बड़ी छाया चांद पर पड़ती है और चंद्रग्रहण लंबी अवधि के होते हैं। हां, सूर्यग्रहण चंद्रग्रहण की तुलना में अधिक होते हैं। इसी वर्ष पांच में से तीन सूर्य के ग्रहण हैं जबकि दो चंद्रमा के ग्रहण हैं। मजे की बात है कि सूर्यग्रहणों के विपरीत चंद्रग्रहण बहुत बड़े भू-भाग से देखे जा सकते हैं। अगर एक जगह चंद्रग्रहण हो रहा है तो पूरे महाद्वीप से दिखाई देगा। इस बार का ग्रहण सम्पूर्ण भारत में दिखेगा। पूरे एशिया, रूस के कुछ भागों से और दक्षिण में ऑस्ट्रेलिया के कुछ भागों से देखा जाएगा।

 

क्या है वैज्ञानिकों की राय

सरल खगोलीय घटना: प्रो. रमेश कपूर
ब्लड मून एक प्रचलित तथ्य है लेकिन इसका महत्व न तो खगोल विज्ञान में और न ही भारत के प्राचीन विज्ञान में है। पिछली 31 जनवरी का चंद्रग्रहण लाल तांबई रंग में नजर आया था। आर्यभट्ट ने भी अपनी पुस्तक आर्यभटीय में लिखा है कि चंद्रमा का रंग पूर्ण ग्रहण के समय तांबई होता है। अगर आसमान पूरी तरह साफ रहा तो चंद्रमा का गोला हल्का नारंगी रंग लिए एक समान लाल रंग में नजर आएगा। हां! अगर कहीं ज्वालामुखी फटा हो तो उसकी धूल के कारण रंग थोड़ा धूमिल हो सकता है। क्योंकि, ज्वालामुखी की धूल आसमान में काफी ऊपर तक पहुंचती है। लेकिन, इसे ब्लड मून नहीं कहेंगे। ब्लड मून के लिए एक के बाद एक चार पूर्ण चंद्रग्रहण होने आवश्यक हैं।

इस बार तीन ग्रहणों की तिकड़ी आई है। उसमें से पहला 31 जनवरी 2018 को हुआ। दूसरा 27 जुलाई 2018 को होने जा रहा है जबकि इस कड़ी का अगला और तीसरा चंद्रग्रहण 21 जनवरी 2019 को है। इसलिए इसमें से कोई भी ग्रहण ब्लड मून नहीं कहलाएगा। लेकिन, खूबसूरत लाल चंद्रमा को उसी रूप में देखें। ब्लड मून जैसे हिंसात्मक शब्द का इस्तेमाल करने की क्या आवश्यकता है। कोई भी ग्रहण किसी के लिए कोई भी आपदा प्रस्तुत नहीं कर सकता। इसे लेकर निश्चिंत रहें। यह एक सरल खगोलीय घटना है।

 

पृथ्वी के छायावृत के मध्य से गुजर रहा चांद: पीयूष पाण्डेय
पूर्ण चंद्रग्रहण की अवधि लगभग एक घंटे के आसपास होती है। लेकिन, इस बार चंद्रमा पृथ्वी के दूसरी तरफ है और पृथ्वी की छाया का आकार चंद्रमा का लगभग ढाई गुणा है। इस बार के चंद्रग्रहण में चंद्रमा पृथ्वी के छायावृत के लगभग मध्य से गुजर रहा है। जब चंद्रमा पृथ्वी के छायावृत के मध्य से गुजरता है तब पूर्ण चंद्रग्रहण की अवधि सबसे अधिक होती है। किसी पूर्ण चंद्रग्रहण की अधिकतम अवधि 1 घंटा 47 मिनट हो सकती है और यह सुखद संयोग है कि इस बार का पूर्ण चंद्रग्रहण लगभग 1 घंटा 44 मिनट (1 घंटा 43.6 मिनट) का है। इसलिए यह ग्रहण अद्भुत है। इससे पहले 16 जुलाई 2000 को ऐसा ग्रहण हुआ था, जिसकी अवधि महत्तम थी। एक सुंदर बात यह है कि चंद्रग्रहण के समय चंद्रमा लाल दिखाई देता है।

दिलचस्प बात यह है कि चंद्रमा काला होने के बावजूद लाल नजर आता है। इसकी वजह यह है कि जब चंद्रमा पृथ्वी की छाया में आता है तो सूर्य से आती रोशनी को पृथ्वी पूरी तरह ढंक लेती है। सूर्य का प्रकाश जब पृथ्वी के वायुमंडल से होकर गुजरता है तो गैसों के अणु और धूलकण के चलते प्रकीर्णित हो जाता है। नीला प्रकाश सबसे अधिक प्रकीर्णित होता है और बिखर जाता है लेकिन लाल रंग की तीव्रता कम होती है और इसलिए वह कम बिखरता है। चंद्रग्रहण के दौरान लाल रंग का वही अवशिष्ट प्रकाश जब चंद्रमा पर पड़ता है तो वह लाल दिखाई देता है। लेकिन, इसे ब्लड मून कहना गलत होगा।

Ram Naresh Gautam
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