दिवाली के बाद आसमानी आतिशबाजी आज रात

टूटते तारों की आतिशबाजी से चमक उठेगी काली रात
दर्शनीय होगी 'लियोनेड उल्कावृष्टि'

By: Rajeev Mishra

Published: 17 Nov 2020, 12:07 AM IST

बेंगलूरु. कोरोना महामारी के कारण भले ही इस वर्ष दिवाली की रात आतिशबाजियों पर प्रतिबंध रहा लेकिन, प्रकृति की आसमानी आतिशबाजी पर कोई रोक नहीं। 17-18 नवंबर की काली रात टूटते तारों की आतिशबाजी से चमक उठेगी।

भारतीय ताराभौतिकी संस्थान के प्रोफेसर (सेनि) रमेश कपूर ने बताया कि पृथ्वी से देखी जाने वाली जितनी भी उल्कावृष्टियां हैं उनमें लियोनेड उल्कावृष्टि सबसे दर्शनीय है। यद्यपि यह 33 वर्ष के अंतराल में अधिक प्रखर हो उठती है पर हर साल मध्य नवंबर में खगोल के शौकीन इसका नजारा देखने को बेताब रहते हैं। इस बार यह 17-18 नवंबर की रात दर्शनीय होगी।

  • 17-18 नवंबर की काली रात टूटते तारों की आतिशबाजी से चमक उठेगी।

उन्होंने बताया कि लियोनेड अर्थात सिंह-तारा समूह की दिशा से आती उल्कावृष्टि है जिसे आसमानी आतिशबाजी कहना ज्यादा उपयुक्त रहेगा। उल्काएं भीतरी सौरमंडल में आते धूमकेतुओं के छूटे हुए पदार्थ का हिस्सा हैं। यह सूर्य के निकट पहुंचते-पहुंचते धूमकेतु के नाभिक से अलग होते हुए एक नदी का रूप ले लेेते हैं। इस नदी से जब पृथ्वी गुजरती है तो इसके गुरुत्वाकर्षण के कारण खिंचकर पृथ्वी की ओर गिरने लगते हैं। वातावरण से रगड़ खाकर ये इतने गर्म हो जाते हैं कि अधिकांश 80-90 किमी की ऊंचाई पर एक चमकीले पटाखे के रूप में जलकर खाक हो जाते हैं। लियोनेड उल्कावृष्टि 1833 और 1866 में एक बारिश की तरह से आई। जब हजारों उल्काएं प्रतिघंटे आसमान में चमकते दिखाई दिए। तब से हर 33 साल में एक उम्मीद जगी रही हाल ही के वर्षों में ये वृष्टि 1966 और 1999 में देखी गई।

  • जैसलमेर जैसी मरुभूमि में इसका नजारा शानदार होगा

लियोनेड उल्काएं पृथ्वी की ओर सामने से आती हैं

लियोनेड उल्काएं पृथ्वी की ओर सामने से आती हैं। यद्यपि विभिन्न उल्काओं की गति 40 किलोमीटर प्रति सैकंड हो सकती हैं लेकिन, लियोनेड 70.8 किमी प्रति सेकेंड की गति से हमारी ओर आते हैं। ये उल्काएं धूमकेतु 55 पी/टेंपल-टटल धूमकेतु के छूटे हुए अवशेष हैं। इस धूमकेतु का पता पहली बार 1865 में चला था। लियोनेड उल्कावृष्टि 6 से 20 नवंबर के बीच हमारे आकाश में होती हैं। इसका अधिकतम नजारा 17-18 नवंबर की रात को होता है। इस वर्ष मौका बहुत अच्छा है क्योंकि, मध्य रात्रि से बहुत पहले चंद्रमा अस्त हो चुका होगा। इस वर्ष प्रति घंटा 15 उल्काएं तक देखी जा सकेंगी। किसी सुनसान इलाके में, घर की छत, किसी ऊंची पहाड़ी या जैसलमेर जैसी मरुभूमि में इसका नजारा शानदार होगा। उल्काएं जो पूरी तरह जल नहीं पाती पृथ्वी पर गिर जाती हैं इन्हें उल्का प्रस्तर कहते हैं। इनका गठन सौरमंडल जैसा ही है। वास्तव में लोहे से इंसान का पहला परिचय उल्का प्रस्तरों के जरिए ही हुआ।

Rajeev Mishra Reporting
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