scriptMan is the one who has research, vocals, music and taste - Acharya Dev | मनुष्य वही, जिसमें शोध, स्वर, संगीत और स्वाद है-आचार्य देवेन्द्रसागर | Patrika News

मनुष्य वही, जिसमें शोध, स्वर, संगीत और स्वाद है-आचार्य देवेन्द्रसागर

धर्मसभा का आयोजन

बैंगलोर

Published: December 24, 2021 06:57:12 am

बेंगलूरु. जयनगर के राजस्थान जैन मूर्तिपूजक संघ में आयोजित धर्मसभा में आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने कहा कि मनुष्य क्या है यह प्रश्न जितना अजीब है उतना ही उत्सुकता पैदा करने वाला भी है। हम इस पर बड़ी-बड़ी परिभाषाएं बना सकते हैं और पढ़ भी सकते हैं। शारीरिक संरचना से समझाया जा सकता है कि दो हाथ, दो पैर, दो आंखें, एक नाक और दो कानों के साथ सीधा चलता जीव ही मनुष्य है। पर जब बात आध्यात्मिक चेतना की आती है, तब मनुष्य में भी मनुष्य खोजना मुश्किल हो जाता है। काया तो सभी पा लेते हैं, पर विचार सबको नहीं मिलते। यही विचार है, जिसे मनुष्यता कहते हैं, जो दूसरे जीवों से अलग करते हैं और इसे हम मनुष्य कह सकते हैं।
आखिर मनुष्यता क्या है? यह एक ऐसी समझ है, जो प्रकृति की दी हुई खूबियों को समझती है। उसे महसूस करती है। दूसरे जीवों के तरीकों पर गौर करती है। उनके भोजन से अपने लिए भोजन चुनती है फिर उसे अपनी समझ से मिलाकर बेहतरीन व्यंजन तैयार करती है। यानी उपलब्ध संसाधनों से अपने लिए सर्वश्रेष्ठ की रचना का प्रयत्न करता जीव मनुष्य है और उसकी यह चेतना मनुष्यता है। एक जंगल में चिडिय़ा थी। वह जब बोलती तो जंगल गूंज उठता। चिडिय़ा तो और भी थीं, बोलती भी थीं। पर जब मनुष्य ने उस चिडिय़ा को सुना और दूसरी चिडिय़ों की चहचहाहट सुनी, तब उसने इस चिडिय़ा की आवाज में दूसरों से अंतर पाया। यह अंतर पकड़ पाना मनुष्यता नहीं थी, मनुष्यता तो थी इस अंतर को पकड़ कर उसके जैसी ध्वनि अपने पास उपलब्ध साधनों से बनाना। मनुष्य ने शोध किया और पाया कि उस चिडिय़ा की चोंच में कई छेद हैं, जिनसे कई तरह के स्वर निकल सकते हैं। उसने खोखला बांस लिया और उसमें उतने ही छेद करके, अलग-अलग अंदाज से हवा डाली। एक समय आया जब उतने ही सुर इस बांस के टुकड़े से निकलने लगे, तब दुनिया ने बांसुरी देखी। जानवर की खाल को खोखली लकड़ी पर कसकर ढोल बनाया जा सकतपा है। यह सब हुआ, क्योंकि जीवों में एक जीव ऐसा था, जो शोध जानता था, जो निराश नहीं होता था, बल्कि ऊंचे उठता चला जाता। उसमें आनंद भरता, उसमें उल्लास और उमंग के लिए बड़े ऊंचे स्वप्न देखता। मनुष्य अपने दो होंठों के बीच दांत केवल खाने के लिए नहीं रखता, वह इसके इस्तेमाल से मुस्कुराना जानता है। वास्तविक मनुष्य तो वही है, जिसमें शोध, स्वर, संगीत और स्वाद है। जो इसे बढ़ाना जानता है, जो इसका आनंद लेना जानता है, जो रोज इसे बढ़ाता जाता है, वह मनुष्य है।
मनुष्य वही, जिसमें शोध, स्वर, संगीत और स्वाद है-आचार्य देवेन्द्रसागर
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