मनुष्य का स्वभाव अध्यात्म: देवेंद्रसागर

आचार्य देवेंद्रसागर ने प्रवचन में कहा कि इस दुनिया में धर्म को लेकर जितनी बहस हुई है, उतनी शायद ही किसी और चीज पर हुई होगी।

By: Santosh kumar Pandey

Published: 03 Jan 2020, 09:43 PM IST

बेंगलूरु. आचार्य देवेंद्रसागर ने प्रवचन में कहा कि इस दुनिया में धर्म को लेकर जितनी बहस हुई है, उतनी शायद ही किसी और चीज पर हुई होगी। आज सारी समस्याओं के लिए धर्म को ही दोषी ठहराया जा रहा है। लेकिन यह एक अजीब सी बात है कि धर्म को किसी ने भी सही अर्थों में नहीं लिया। जीवन और जगत के अंतर्संबंधों को समझने की कोशिश में मनुष्य ने धर्म को पाया है। ऋषि- मुनियों ने माना है कि संपूर्णत: स्वीकार न कर पाने पर भी यथासंभव जीवन में धर्म को धारण कर चलना चाहिए।

भगवान महावीर ने धर्म को 'स्वभावÓ माना है - वस्तु मात्र का स्वभाव। हर चीज, चाहे वह जीवित प्राणी हो या निर्जीव पदार्थ, अपने स्वभाव से प्रतिबद्ध है। स्वभाव से कटकर वह अपनी सत्ता से कट जाती है। हम भूल जाते हैं कि हमारा स्वभाव प्रकाश है, अंधकार नहीं। प्रेम है, अहंकार नहीं। एकता है, अनेकता नहीं। हमारा स्वभाव अध्यात्म है, अंध भौतिकता नहीं। स्वभाव से हम जितनी दूर जाते हैं, उतना ही अपने आप से भी दूर चले जाते हैं और स्वयं ही अपने अस्तित्व के लिए खतरा बन जाते हैं।

समय आ गया है कि हम धर्म को सांप्रदायिकता से मुक्त कर सच्चे अर्थों में अंगीकार करें ताकि हमारी आंतरिक अकिंचनता और उससे उत्पन्न अवसाद तो दूर हो ही, हमारा आत्मिक निर्माण भी हो सके।

Santosh kumar Pandey Desk
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