मन भी चंचल घोड़े के समान: डॉ. समकित मुनि

शूले स्थानक में प्रवचन

By: Santosh kumar Pandey

Published: 16 Oct 2020, 10:12 PM IST

बेंगलूरु. अशोकनगर शूले जैन स्थानक में विराजित श्रमण संघीय डॉ. समकित मुनि ने कहा कि घोड़ा चंचल प्राणी है। मन भी चंचल घोड़े के समान है जो इधर-उधर भागता दौड़ता रहता है। इंद्रभूति गौतम ने समाधान दिया कि मन रूपी घोड़े को धर्म शिक्षा रूपी लगाम लगा लेने पर मन उन्मार्ग पर नहीं दौड़ता। मन रूपी घोड़े की सवारी प्रत्येक मानव कर रहा है।

जिसके साथ में धर्म शिक्षा की लगाम है उस मानव का मन गलत रास्ते पर नहीं दौड़ेगा। इंसान की यह परेशानी है कि धर्म में भी मन दौड़ता है, जबकि होना यह चाहिए कि मन में धर्म रहे। मन धर्म में दौड़ता रहे, संसार में नहीं। अनेक व्यक्तियों की शिकायत होती है कि माला-सामायिक में भी मन भागता-दौड़ता रहता है।

मुनि ने कहा कि मन भागने के पीछे यही कारण है कि हमारा अधिकांश समय संसार और अल्प समय धर्म में व्यतीत होता है। मन को टिकाने के लिए ज्यादा समय धर्म को दो। धर्म मंगलरूप है। मंगल की शरण में रहने से मन गलत राह पर नहीं दौड़ता दौड़ेगा। मंगल की शरण न लेने पर दंगल के भाव मन में आते हैं। दंगल के समय मन में पाप होता है, मंगल ब भावों में मन पश्चाताप करता है।

संत दर्शन करते समय आत्म दर्शन के भाव तब जन्मते हैं जब हम मंगल (धर्म) की शरण में रहते हैं। संचालन संघ के मंत्री मनोहरलाल बंब ने किया। प्रेम कुमार कोठारी ने बताया कि मुनि के प्रवचन का प्रतिदिन फेसबुक पर ऑनलाइन प्रसारण किया जा रहा है। इस मौके पर शांतिबाई मरलेचा, इंदिरा बाई चोपड़ा, कनकाबाई मूथा, मानकचंद लुणावत, देवराज चोपड़ा, गणपतराज रुनवाल उपस्थित थे।

Santosh kumar Pandey Desk
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