एक के आगे मोदी, दूसरे के पीछे सिद्धू

एक के आगे मोदी, दूसरे के पीछे सिद्धू

Santosh Kumar Pandey | Publish: Apr, 22 2019 04:42:29 PM (IST) Bangalore, Bangalore, Karnataka, India

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘बागलकोट बनाम बालाकोट’ के बयान से उठा सियासी तूफान शायद 23 अप्रेल के मतदान के बाद थम जाए मगर कांग्रेस की युवा नेता वीणा कशप्पणवर और भाजपा प्रत्याशी पीसी गड्डीगौडर के बीच जारी चुनावी जंग एक महीने बाद ही नतीजे पर पहुंचेगा।

राजीव मिश्रा
बेंगलूरु. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘बागलकोट बनाम बालाकोट’ के बयान से उठा सियासी तूफान शायद 23 अप्रेल के मतदान के बाद थम जाए मगर कांग्रेस की युवा नेता वीणा कशप्पणवर और भाजपा प्रत्याशी पीसी गड्डीगौडर के बीच जारी चुनावी जंग एक महीने बाद ही नतीजे पर पहुंचेगा।

पिछले तीन चुनावों में लगातार जीत दर्ज करने वाले गड्डीगौडर को इस बार वीणा कड़ी टक्कर दे रही हैं। वीणा राजनीति में नई नहीं हैं। वह पूर्व विधायक विजय आनंद कशप्पणवर की पत्नी हैं और जिला पंचायत अध्यक्ष भी रह चुकी हैं। दूसरी ओर लगातार तीन चुनाव जीतकर हैट्रिक लगाने वाले पीसी गड्डीगौडर स्थानीय स्तर पर मतदाताओं का आक्रोश झेल रहे हैं। हालांकि, गांवों में लोग पार्टियों को नजरअंदाज कर देते हैं। उन्हें कांग्रेस या भाजपा से ज्यादा उनके चुनाव चिन्ह याद रहते हैं। उन्हें यह भी पता है कि वोट कहां देना है। मगर खामोश हैं। दूसरी ओर शहरी क्षेत्र के मतदाता सोशल मीडिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रभावित नजर आते हंै।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनाम पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या

एक तरह से इस बार बागलकोट लोकसभा क्षेत्र की लड़ाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनाम पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरामय्या हो गई है। जहां सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रहे भाजपा उम्मीदवार गड्डीगौडर मोदी को आगे कर चुनाव लड़ रहे हैं, वहीं वीणा के पीछे सिद्धरामय्या खड़े हैं। सिद्धरामय्या ने भी स्थानीय स्तर पर नेताओं की अनदेखी कर लिंगायत बहुल इस लोकसभा क्षेत्र में वीणा को उतारकर एक बड़ा दांव खेला है। इसी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत बादामी विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सिद्धरामय्या के लिए अब यह सीट प्रतिष्ठा का विषय बन गया है।
दरअसल, सिद्धरामय्या ने जातिगत समीकरण को साधते हुए एक चतुर राजनीतिक चाल के तहत वीणा को बागलकोट से उम्मीदवार बनाया। वह लिंगायत के ही उप-संप्रदाय पंचमशाली से तालुक रखती हैं। पिछले चार चुनावों में कांग्रेस ने पहली बार इस समुदाय के किसी नेता को अपना उम्मीदवार बनाया है और पार्टी को लगता है कि इसका फायदा उसे मिलेगा।

हालांकि, वीणा की उम्मीदवारी घोषित होते ही पार्टी कुछ वरिष्ठ नेताओं ने अपनी नाराजगी जाहिर की और प्रचार अभियान में शामिल होने से मना कर दिया। लेकिन, सिद्धरामय्या के हस्तक्षेप से स्थिति संभल गई। अब चुनावी जंग में सिद्धरामय्या को जहां मोदी के प्रभाव से दो-दो हाथ करने हैं वहीं बागलकोट लोकसभा के अंतर्गत 8 में से 6 विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा की मौजूदगी चुनौती है।

बादामी विधानसभा क्षेत्र जहां से सिद्धरामय्या ने पिछली बार विधानसभा चुनाव जीता वहां कांग्रेस का प्रभाव अच्छा है। लोगों का कहना है कि उनके आने से सावदत्ती बांध (रेणुका सागर) से पानी मिलने लगा है। इससे फसलों के लिए ही नहीं पेयजल के लिए भी पानी की सुविधा बढ़ी है।

गड्डीगौडर के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर
दूसरी तरफ गड्डीगौडर एक सभ्य नेता माने जाते हैं। सभी संप्रदायों के साथ उनके अच्छे संबंध हैं। एक स्थानीय नेता ने कहा कि गड्डीगौडर दूसरे नेताओं से अलग लोगों को अपने घर में बुलाते हैं और उनके दु:ख-दर्द सुनते हैं। इन सबके बावजूद लगातार तीन बार से चुनाव जीतने वाले वर्तमान सांसद के खिलाफ थोड़ी सत्ता विरोधी लहर जरूर है। जहां गड्डीगडौर गनिगा समुदाय से आते हैं वहीं वीणा पंचमशाली समुदाय की हैं। क्षेत्र में दोनों समुदायों के मत लगभग बराबर है। यहां कुरूबा लगभग 2.5 लाख की तादाद में है और खुद सिद्धरामय्या के कुरूबा समुदाय से होने के कारण भाजपा नेता केएस ईश्वरप्पा कोई कसर नहीं छोड़ रहे।

अब तक का इतिहास
बागलकोट संसदीय क्षेत्र कभी कांग्रेस का गढ़ था। यह लोकसभा क्षेत्र वर्ष 1967 में अस्तित्व में आया तब से लेकर वर्ष 1991 तक यहां कांग्रेस का ही वर्चस्व रहा। वर्ष 1996 में पहली बार कांग्रेस को यहां शिकस्त मिली। जनता दल एस उम्मीदवार एच वाई मेटी ने कांग्रेस उम्मीदवार सिद्धू न्यामेगौड़ा को 1332 मतों से हराकर पहली बार इस क्षेत्र में कांग्रेस का वर्चस्व तोड़ा। इसके बाद वर्ष 1998 में हुए चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े की पार्टी लोक शक्ति के टिकट पर अजय कुमार सरनायक ने यहां जीत का परचम लहराया। उन्होंने कांग्रेस प्रत्याशी सिद्धू न्यामेगौड़ा को 83,632 मतों से पराजित किया।

हालांकि, सिद्धू न्यामेगौड़ा ने क्षेत्र में सिंचाई के लिए निजी स्तर पर एक आंदोलन चलाया और बैरेज का निर्माण करवाया जिसके लिए वे राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में रहे। क्षेत्र में लोकप्रिय होने के बावजूद कांग्रेस के प्रति मतदाताओं की नाराजगी के कारण उन्हें भी हार का मुंह देखना पड़ा। अगले साल वर्ष 1999 में कांग्रेस ने फिर एक बार वापसी की। कांग्रेस ने आरएस पाटिल को मैदान में उतारा तो अजय कुमार सरनायक लोक शक्ति से जनता दल यू में चले गए। पाटिल ने अजय कुमार सरनायक को 76,434 मतों से पराजित कर यह सीट कांग्रेस की झोली में डाल दी। कांग्रेस की बागलकोट में वह आखिरी विजय थी। इसके बाद यह क्षेत्र भगवा रंग में रंग गया। वर्ष 2004 तथा वर्ष 2009 के बाद वर्ष 2014 के चुनाव में भी भाजपा प्रत्याशी पीसी गड्डीगौडर ने लगातार जीत हासिल की।

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