मैसूरु की सांस्कृतिक विरासत गोंबे हब्बा

मैसूरु की सांस्कृतिक विरासत गोंबे हब्बा

Sanjay Mohan Kulkarni | Updated: 06 Oct 2019, 09:48:26 PM (IST) Bangalore, Bangalore, Karnataka, India

मैसूरु की सांस्कृतिक विरासत गोंबे हब्बा
महाराजाओं के जमाने से चली आ रही है परंपरा
गुडिय़ों में सजते हैं रामायण और महाभारत के प्रसंग

मैसूरु की सांस्कृतिक विरासत गोंबे हब्बा
बेंगलूरु. दशहरा महोत्सव के दौरान रामायण तथा महाभारत के पात्रों पर आधारित गुडिय़ों की प्रदर्शनी मैसूरु क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत रही है। 16वीं सदी में वाडियार राजवंश काल में आरंभ परंपरा अब तक अबाधित रुप से बरकरार है। मैसूरु तथा आस-पास के गांवों में दशहरा महोत्सव के दौरान लोग ऐसी गुडिय़ों को अपने घरों में सजाते हैं जिसे देखने के लिए पड़ोसियों को आमंत्रित किया जाता है।
स्थानीय मान्यता है कि मैसूरु शहर में गोंबे हब्बा के बगैर दशहरा महोत्सव अधूरा होता है। यहां के हर परिवार में दशहरा महोत्सव के दौरान नौ पायदानों पर गुडियों को सजा कर लोगों को इस प्रदर्शनी को देखने के लिए आमंत्रित किया जाता है। नवरात्रि उत्सव के दौरान हर दिन शक्ति देवी के स्वरुप के अनुसार प्रदर्शनी की सजावट बदली जाती है।नवरात्रि महोत्सव के दौरान गोंबे हब्बा की तैयारी में पूरे परिवार के सदस्य जुड़ जाते हैं। कथानकों पर आधारित पात्रों को कथा के अनुसार गुडिय़ा शक्ल में जोडऩे में काफी समय लगता है। इसके लिए कई माह पहले से तैयारियां करनी पड़ती है।
इस क्षेत्र में जब बेटी की शादी होती है तब बेटी के अभिभावक उसे ऐसी गुडिय़ों के संग्रह के साथ विदा करते है। संग्रहण की मुख्य गुडिय़ा को 'पट्टद गोंबेÓ कहा जाता है। प्रमुख गुडिय़ा का निर्माण चंदन की लकड़ी से किया जाता है। यहां पर ऐसे सैकड़ों परिवार मौजूद हैं जिनके पास 150 से 200 वर्ष पुरानी गुडिय़ों का संग्रहण हैं। गुडिय़ों की प्रदर्शनी में सीता का स्वयंवर, राम वनवास, जटायु के साथ रावण का संघर्ष, राम-रावण युद्ध, लंकादहन, महाभारत का कुरुक्षेत्र, दुर्योधन तथा भीम के बीच का गदा युद्ध, चक्रव्यूह की रचना, भगवान कृष्ण का विश्वरूपदर्शन, गीतोपदेश, गोवर्धन पर्वत, भगवान शिव का कैलास पर्वत जैसे कथानकों के आधार पर इन गुडिय़ों को रखकर सजावट की जाती है।
इन गुडिय़ों की बड़ी खासियत यह है है कि स्थानीय कलाकार तथा गृहिणियां स्वयं ऐसी गुडिय़ां तैयार करती है। गुडिय़ों को 5 इंच से लेकर 2 फीट तक की ऊंचाई में बनाया जाता है। दशहरा महोत्सव के दौरान ऐसी गुडियां खरीदने की होड़ लगती है। दशहरा महोत्सव के दौरान अंबाविलास महल परिसर में भी गुडिय़ा प्रदर्शनी लगाई जाती है। इसे 'गोंबे तोट्टीÓकहा जाता है। गुडिय़ों की इस अनूठी प्रदर्शनी को देखने के लिए पर्यटकों की लंबी कतारे लगती है। ऐसी गुडिय़ों को तैयार करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है। दशहरा महोत्सव के पश्चात इन गुडिय़ों को सुरक्षित रुप से रखा जाता है। गृहिणियां इसे परिवार की धरोहर मानते हुए इनकी सुरक्षा पर ध्यान देती है। लिहाजा गुडिय़ों के संग्रहण के साथ परिवार की गृहिणी का भावनात्मक रिश्ता होता है। आज भी मैसूरु शहर में कई परिवारों के पास विरासत में मिली 500 से 1500 गुडिय़ां हैं। यह संग्रहण परिवार में वंश परंपरा से आगे हस्तांतरित किया जाता है।

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