राज्यों के अलग झंडे के लिए कोई प्रावधान नहीं, संविधान में नहीं है कोई व्याख्या

राज्य ध्वज को केंद्र से अनुमति मिलने की संभावना नगण्य
केंद्र के अधिकारी ने कहा, राज्यों के अलग झंडे का उदाहरण नहीं

बेंगलूरु. विधानसभा चुनाव से सिर्फ दो महीने पहले राज्य के अलग ध्वज के प्रस्ताव को मंजूरी देने को लेकर जहां सत्तारुढ़ कांग्रेस और मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के बीच वाकयुद्ध जारी है। वहीं, झंडे के अनावरण और मंजूरी के एक दिन बाद केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि देश में राज्यों के अलग झंडे को लेकर उदाहरण नहीं है। ऐसा कोई प्रावधान नहीं कि कोई राज्य या केंंद्र शासित प्रदेश अपना झंडा तय करे। सिर्फ जम्मू-कश्मीर के पास संविधान की धारा ३७० के तहत प्राप्त विशेष दर्जे के कारण अलग राज्य ध्वज है। हालांकि, उक्त अधिकारी ने कहा कि संविधान में अलग राज्य ध्वज का उल्लेख नहीं है। संविधान में अलग राज्य ध्वज की अनुमति या प्रतिबंध का कोई प्रावधान नहीं है। देश में लागू ध्वज व चिह्न कानून के मुताबिक सिर्फ तिरंगे को ही मान्यता प्राप्त है। उक्त अधिकारी ने कहा कि राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर तिरंगे को मान्यता प्राप्त है और उसी का देश भर में इस्तेमाल होना संवैधानिक और तार्किक तौर पर सही है।
माना जा रहा है कि भाजपा के विरोध और केंद्र के ताजा रूख से राज्य के प्रस्तावित ध्वज को गृह मंत्रालय से हरी झंडी मिलनी मुश्किल है। उक्त अधिकारी ने कहा कि राष्ट्रीय ध्वज संहिता और राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न (अनुचित प्रयोग निषेध) कानून सिर्फ राष्ट्र ध्वज तिरंगे से जुड़े मामलों के लिए है, इसमें राज्य या किसी अन्य ध्वज का जिक्र नहीं है। उक्त अधिकारी ने कहा कि देश में जम्मू-कश्मीर राज्य ही एकमात्र अपवाद है लेकिन उसे संविधान के तहत विशेष अधिकार प्राप्त हैं। हालांकि, प्रतीक चिह्न को लेकर नियम अलग है। राष्ट्रीय चिह्न के अलावा राज्यों के भी अपने चिह्न हैं।
उक्त अधिकारी ने कहा कि अगर किसी राज्य को अलग ध्वज की अनुमति दी जाती है तो भविष्य में सिर्फ अन्य राज्य ही नहीं बल्कि जिले और गांवों से भी विशिष्ट पहचान के नाम पर अलग-अलग झंडे की मांग उठेगी और यह काफी अराजक स्थिति पैदा करेगा। केंद्र इसे लेकर चिंतित रहा है। हालांकि, गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने शुक्रवार को कर्नाटक के अलग ध्वज के प्रस्ताव के बारे में पूछे जाने पर कहा कि मंत्रालय को अभी तक ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं मिला है। ऐसे में अभी इस पर कुछ कहना सही नहीं होगा।

कर्नाटक सरकार के अलग ध्वज को सैद्धांतिक मंजूरी देने के बाद यह सवाल उठा है

कानून बना सकती है सरकार
सूत्रों के मुताबिक कर्नाटक के अलग ध्वज को मंजूरी देने की मांग के बाद केंद्र सरकार ऐसे मांगों से निपटने के लिए काूननी दायरे और संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक एक व्यवस्था बनाने पर भी विचार कर रही है। मंत्रालय के एक अधिकारी ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर कहा कि हमारा अवधारणा एक राष्ट्र-एक ध्वज की है। संविधान में अलग ध्वज अनुमति देने या नहीं देने के बारे में कोई प्रावधान नहीं है। उक्त अधिकारी ने कहा कि कर्नाटक में अभी जिस कन्नड़ ध्वज का इस्तेमाल किया जाता है वह जनता का प्रतिनिधित्व करता है, सरकार नहीं। इसका उपयोग राष्ट्रीय उत्सवों- गणतंत्र या स्वतंत्रता दिवस पर नहीं होता है। हालांकि, राज्य के स्थापना दिवस पर इसे फहराया जाता है।
कांग्रेस ने घेरा, भाजपा ने उठाया सवाल
राज्य के अलग ध्वज के मुद्दे पर खामोशी को लेकर सत्तारुढ़ कांग्रेस ने शुक्रवार को भाजपा को घेरा तो भाजपा ने शासन के अंतिम समय में अलग ध्वज के बारे में निर्णय करने के लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाए। कांग्रेस ने कहा कि क्या अब भाजपा के सांसद और उसके प्रदेश अध्यक्ष बी एस येड्डियूरप्पा केंद्र सरकार पर राज्य के झंडे को स्वीकृति देने के लिए दबाव डालेंगे। प्रदेश कांग्रेस ने ट्वीट कर कहा कि कन्नड़ स्वभिमान के प्रति उदासीन होने के कारण भाजपा के नेता इस मसले पर मौन साधे हुए हैं। इसके जवाब में येड्डियूरप्पा ने राज्यपाल वजूभाई वाळा से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग लेकर मुलाकात से पहले पत्रकारों से बातचीत में कहा कि सिद्धरामय्या सरकार सिर्फ राजनीतिक लाभ के लिए अलग ध्वज के मसले को हवा दे रही है। येड्डियूरप्पा ने कहा कि अगर सिद्धरामय्या वाकई कन्नड़ गौरव और अस्मिता को लेकर चिंतित हैं और उन्हें अलग नाड ध्वज की आवश्कता महसूस हुई तो पिछले चार साल के शासन में उन्होंने पहल क्यों नहीं की। सिद्धू को शासनकाल के अंतिम समय में ही इस मसले की याद क्यों आई।

कुमार जीवेन्द्र झा
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