अब लोग सच्चे साधुओं पर भी शंका करते हैं

अब लोग सच्चे साधुओं पर भी शंका करते हैं

Santosh Kumar Pandey | Updated: 12 Jun 2019, 10:19:34 PM (IST) Bangalore, Bangalore, Karnataka, India

आचार्य देवेंद्रसागर सूरिश्वर एवं मुनि महापद्मसागर ने बुधवार को बेंगलूरु में प्रवेश किया। वासुपूज्य स्वामी जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ अक्कीपेट के श्रद्धालुओं की उपस्थिति में आचार्य के पदार्पण ने नगरी को प्रफुल्लित कर दिया।

आचार्य देवेंद्रसागर सूरिश्वर का बेंगलूरु में आगमन
धर्मसभा को किया सम्बोधित
बेंगलूरु. आचार्य देवेंद्रसागर सूरिश्वर एवं मुनि महापद्मसागर ने बुधवार को बेंगलूरु में प्रवेश किया। वासुपूज्य स्वामी जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ अक्कीपेट के श्रद्धालुओं की उपस्थिति में आचार्य के पदार्पण ने नगरी को प्रफुल्लित कर दिया।

सुबह आचार्य की अगवानी के लिए अक्कीपेट जैन संघ के ट्रस्टी, जैन मंडल, श्राविका मंडल, बालिका मंडल सहित अनेक श्रद्धालुओं ने अगवानी की। श्रद्धालुओं के साथ विहार करते हुए आचार्य देवेंद्रसागर एवं मुनि महापद्मसागर सुराणा राठोड़ जैन भवन दासरहल्ली पहुंचे। दासरहल्ली में आयोजित धर्मसभा में आचार्य ने कहा कि वर्तमान में नकली और ढोंगी साधुओं ने वातावरण को इतना प्रदूषित कर रखा है कि लोग सच्चे साधुओं पर भी शंका करते हैं। इसका कारण यह है कि यह पहचानना बहुत मुश्किल हो गया है कि कौन सच्चा साधु है और कौन ढोंगी है। सच्चा साधु तीन बातों से हमेशा दूर रहता है- नमस्कार, चमत्कार और दमस्कार।

इनके अर्थ जरा विस्तार से बताना आवश्यक है। ‘नमस्कार’ से दूर रहने का अर्थ है कि सच्चा साधु केवल अपने से बड़े साधु को प्रणाम करता है, किसी गृहस्थी को कभी नहीं, चाहे वह कितना भी प्रभावशाली या शक्तिशाली क्यों न हो। जो साधु किसी ताकतवर गृहस्थी को स्वयं पहल करके प्रणाम करता है, वह चापलूस हो सकता है, साधु नहीं। ‘चमत्कार’ से दूर रहने का अर्थ है कि सच्चा साधु कोई चमत्कार नहीं दिखाता। चमत्कार दिखाकर लोगों को भ्रमित करने वाले व्यक्ति जादूगर या बाजीगर हो सकते हैं, साधु नहीं। सच्चा साधु तो हर जगह केवल परम प्रभु की कृपा का ही चमत्कार देखता है।

कभी उसका श्रेय स्वयं नहीं लेता। दमस्कार’ के दूर रहने का अर्थ है कि सच्चा साधु कभी अपने लिए धन एकत्र नहीं करता और न किसी से धन की याचना करता है। वह केवल अपनी आवश्यकता की न्यूनतम वस्तुएं मांग सकता है, कोई संग्रह नहीं करता। धन मांगने और संग्रह करने वाला व्यक्ति निश्चय ही ढोंगी होता है, सच्चा साधु नहीं। यदि हम अपने सम्पर्क में आने वाले साधुओं पर इन तीन कसौटियों को लागू करें, तो सरलता से पहचान सकते हैं कि कौन सा साधु सच्चा है और कौन सा झूठा।

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