चार में से एक व्यक्ति को स्ट्रोक का खतरा

- स्ट्रोक प्रबंधन के लिए सरकारी चिकित्सकों को तैयार करेगा स्वास्थ्य विभाग
- संगठित तीव्र स्ट्रोक केंद्र की जरूरत
- विश्व स्ट्रोक दिवस आज (world stroke day)

By: Nikhil Kumar

Updated: 29 Oct 2020, 08:04 AM IST

बेंगलूरु. चार में से एक व्यक्ति अपने जीवन में स्ट्रोक (One in four people are at risk of stroke) का शिकार होते हैं। स्ट्रोक के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आधुनिक जीवनशैली, मधुमेह, धूम्रपान, उच्च रक्तचाप, मोटापा और अत्याधिक कोलेस्ट्रॉल इसके प्रमुख कारण हैं। हालांकि, करीब 20 फीसदी मामलों में कारण अज्ञात होते हैं।

25 फीसदी मरीज स्ट्रोक के
राष्ट्रीय मानसिक आरोग्य व स्नायु विज्ञान संस्थान (निम्हांस) में हर महीने स्ट्रोक के 250 से 300 मरीजों का उपचार होता है। स्ट्रोक के मरीजों में 23 से लेकर 82 आयु वर्ग तक के लोग तक शामिल हैं। विभिन्न जिला और तालुक अस्पताल स्ट्रोक के मरीजों को निम्हांस भेजते हैं। निम्हांस के आपातकालीन विभाग पहुंचने वाले मरीजों में से करीब 25 फीसदी मरीज स्ट्रोक के होते हैं।

20 स्ट्रोक देखभाल केंद्र स्थापित करने का लक्ष्य

प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में न्यूरोलॉजिस्ट की कमी है। विशेष कर जिला व तालुक अस्पतालों में। जरूरत के समय एमबीबीएस व अन्य विशेषज्ञ भी स्ट्रोक के मरीजों का प्राथमिक उपचार कर सकें इसके लिए निम्हांस के सहयोग से स्वास्थ्य व परिवार कल्याण विभाग सरकारी अस्पतालों के चिकित्सका अधिकारियों को प्रशिक्षण देगा। स्वास्थ्य विभाग ढाई वर्षीय प्रशिक्षण कार्यक्रम की योजना बना रहा है। इससे बेंगलूरु व पड़ोसी जिलों में करीब 20 स्ट्रोक देखभाल केंद्र स्थापित करने में मदद मिलेगी। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को इसके लिए प्रस्ताव भेजा गया है।

हब एंड स्पोक मॉडल

निम्हांस (The National Institute of Mental Health and Neuro-Sciences) में न्यूरोलॉजी विभाग के अतिरिक्त प्रोफेसर डॉ. पी. आर. श्रीजितेश ने बताया कि स्ट्रोक प्रबंधन के लिए हब एंड स्पोक मॉडल अपनाने की जरूरत है। जिसके तहत प्रदेश के विभिन्न अस्पताल निम्हांस से जुड़े होंगे। देश में बहुत कम अस्पतालों में संगठित तीव्र स्ट्रोक सेवाएं उपलब्ध हैं। सरकारी अस्पतालों में तो और भी कम। वैश्विक मानकों के अनुसार हर 50-60 किलोमीटर पर संगठित तीव्र स्ट्रोक केंद्र की जरूरत है। सरकारी योजनाओं के कारण निम्हांस स्ट्रोक के करीब 95 फीसदी मरीजों को नि:शुल्क सेवा दे रहा है।

डॉ. श्रीजितेश ने बताया कि स्ट्रोक के बाद गोल्डन ऑवर में जल्द से जल्द मरीज का उपचार होना चाहिए। परिधीय और केंद्रीय स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों के बीच के अंतर को कम करना होगा। परिधीय केंद्रों में कार्यरत चिकित्सकों को तीव्र स्ट्रोक प्रबंधन के क्षेत्र में प्रशिक्षित करने की जरूरत है।

80 फीसदी मरीज इस्केमिक स्ट्रोक के
हर वर्ष प्रति लाख आबादी पर 119 से 145 लोग स्ट्रोक का शिकार होते हैं। स्ट्रोक के मरीजों में से 80 फीसदी मरीज इस्केमिक स्ट्रोक (Ischemic stroke) के कारण अस्पताल पहुंचते हैं। 25 फीसदी इस्केमिक स्ट्रोक मामूली स्ट्रोक होते हैं। 30 फीसदी स्ट्रोक मेजर होते हैं। रक्त वाहिकाएं अवरोधित होने से ऐसा होता है। इन 30 फीसदी मरीजों में से 90 फीसदी मरीजों की मौत हो जाती है

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Nikhil Kumar Reporting
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