कांग्रेस का सिर्फ एक गढ़ बचा

पुराने मैसूरु और मुंबई-कर्नाटक में भाजपा की जोरदार वापसी

By: Ram Naresh Gautam

Published: 16 May 2018, 06:32 PM IST

बेंगलूरु. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र में अपना दबदबा कायम रखा लेकिन लिंगायत और वोक्कालिगा बहुल क्षेत्रों में उसे आशा के अनुरूप नतीजे नहीं मिले। चुनाव परिणामों से यह साबित हो गया कि लिंगायत को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने की रणनीति कांग्रेस के काम नहीं आई।

अगर राज्य को चार जोन मुंबई-कर्नाटक, हैदराबाद-कर्नाटक, तटीय कर्नाटक और ओल्ड मैसूरु में बांटकर आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले 2013 के चुनाव में कांग्रेस ने चारों क्षेत्रों में दबदबा कायम किया था। तब भाजपा बिखरी हुई थी और उसके खिलाफ जबरदस्त सत्ता विरोधी लहर थी। लेकिन, इस बार वोटिंग पैटर्न पारंपरिक रहा और पूरी तस्वीर बदल गई।

मुंबई-कर्नाटक में फिर एक बार कमल खिला जो ङ्क्षलगायत बहुल क्षेत्र है। यह क्षेत्र पिछले चुनाव में भाजपा के हाथ से निकल गया था लेकिन भाजपा ने इस बार अपना गढ़ बचा लिया। पिछले चुनाव में कांग्रेस को यहां की 50 में से 31 सीटें मिली थीं। तब कांग्रेस ने विजयपुर की 8 में से 7 और बागलकोट की 7 में से 6 सीटें जीतकर भाजपा का दो जिलों में लगभग सफाया कर दिया था। लेकिन, इस बार मुंबई-कर्नाटक के सभी 6 जिलों में भाजपा ने वापसी करते हुए 50 में से 30 सीटें जीती जबकि पिछली बार उसे सिर्फ 13 सीटें हाथ लगी थी।

वर्ष 2008 के चुनावों में भाजपा को यहां 38 सीटें मिली थीं। सरकार गठन में अहम भूमिका निभाने वाले इस क्षेत्र में कांग्रेस इस बार 31 से घटकर 17 पर आ गई। यहां उसे 14 सीटों का नुकसान हुआ। बेलगावी में अपना दबदबा कायम रखते हुए भाजपा ने 18 में से 10 सीटें जीत ली। बागलकोट में इस बार 7 में से 5 सीटें भाजपा के खाते में आई।

ओल्ड मैसूरु क्षेत्र में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। ओल्ड मैसूरु की कुल 115 सीटों में से कांग्रेस ने पिछली बार 54 सीटें जीती थी लेकिन इस बार वह 37 सीटों पर सिमट गई। यहां उसे 17 सीटों का नुकसान हुआ। यहां एक गौर करने वाली बात यह है कि कई ऐसी सीटों पर जहां कांग्रेस और जनता दल (ध) के बीच सीधी टक्कर में थी भाजपा ने जानबूझकर कमजोर उम्मीदवार उतारा।

हालांकि, इसके बावजूद जनता दल (ध) जिसे पिछली बार यहां 34 सीटें मिली थी 31 पर ही रह गई। वहीं भाजपा जिसे महज 18 सीटें हासिल हुई थी इस बार 43 सीटें लेकर ओल्ड मैसूरु क्षेत्र में भी अपना दबदबा कायम रखा। विशेष रूप से शिवमोग्गा की 7 में से 6, चिकमग्गलूरु की 5 में से 4, चित्रदुर्गा की 6 में से 5, दावणगेरे की 8 में से 6 और कोडुगू की दोनों सीटें भाजपा जीती। जनता दल (ध) ने मंडया की सभी 7, हासन की 7 में से 6 सीटें जीती। वहीं बेंगलूरु शहर की 26 सीटों पर हुए चुनाव में से 13 कांग्रेस, 12 भाजपा और 2 जनता दल (ध) के नाम रहे।

तटीय कर्नाटक में भी कांग्रेस को भारी शिकस्त मिली। यहां के तीन जिलों में से एक में कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया। इस क्षेत्र की कुल 19 सीटों में से पिछली बार कांग्रेस को 13, भाजपा को 3 और निर्दलीय को 3 सीटें मिली थीं। इस बार परिणाम पूरी तरह उलट गया और कांग्रेस महज 3 सीटों पर सिमट गई जबकि भाजपा ने 16 सीटें लेकर बड़ी बढ़त हासिल की।

उडुपी की सभी 5 सीटें जीतकर भाजपा ने कांग्रेस का सफाया कर दिया। तटीय कर्नाटक में भाजपा ने जिस तरह से धार्मिक आधार पर वोटों के धु्रवीकरण का प्रयास किया उसमें उसे सफलता मिली। यहां कांग्रेस के हाथ से 10 सीटें निकल गईं।हालांकि, हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र में कांग्रेस अपना गढ़ बचाने में कामयाब रही। वरिष्ठ कांग्रेस नेता एम. मल्लिकार्जुन खरगे के इस गृह क्षेत्र में भाजपा ने हालांकि, वापसी की लेकिन कांग्रेस को पछाडऩे में कामयाब रही। यहां की कुल 40 सीटों में से पिछली बार कांग्रेस 23 सीटें जीती थी और इस बार उसने 21 सीटें हासिल की है।

पिछली बार इस क्षेत्र में केजेपी को 4 और बीएसआर कांग्रेस को 2 सीटें मिली थी जबकि भाजपा के हाथ सिर्फ 5 सीटें लगी थी। इस बार एकजुट भाजपा ने यहां 15 सीटें जीतकर अच्छी वापसी की। जनता दल (ध) को पिछली बार इस क्षेत्र में 5 सीटें मिली थी और इस बार भी उसे 4 सीटें मिली है। कुल मिलाकर इस क्षेत्र में कांग्रेस को सिर्फ 2 सीटों का ही नुकसान हुआ।

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