...ताकि दर्द से मिले छुटकारा और कैंसर के मरीज की सम्मानजनक हो मौत

  • अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार देश में हर वर्ष करीब दस लाख मरीज अनावश्यक रूप से असहनीय दर्द झेलते हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने दर्द से छुटकारा को महत्वपूर्ण मानव अधिकारों में रखा है।

By: Nikhil Kumar

Published: 21 Nov 2020, 10:04 AM IST

- उम्मीद हार चुके कैंसर मरीजों की जिंदगी आसान बनाने की कवायद
- किदवई करता है अफीम का सबसे ज्यादा इस्तमाल
- हर वर्ष पहुंचते हैं 1200 नए और 10 हजार पुराने मरीज
- पैलिएटिव केयर

बेंगलूरु.

किदवई मेमोरियल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑन्कोलॉजी (केएमआइओ) ने अप्रेल 2017 में प्रदेश के पहले सरकारी पैलिएटिव केयर यानी दर्द से मुक्ति देने वाली देखभाल सेल की शुरुआत की। हालांकि, किदवई वर्ष 1988 से ही पैलिएटिव देखभाल इकाई चलाता आ रहा है। किदवई ऐसा करने वाला देश के गिनेचुने कैंसर सरकारी अस्पतालों में एक था। केरल और महाराष्ट्र के बाद कर्नाटक देश का पहला ऐसा राज्य है जहां पर पैलिएटिव देखभाल नीति (Palliative Care Policy) है।

दरअसल कैंसर के अंतिम चरण में पहुंच चुके कई ऐसे मरीज होते हैं जिन्हें ठीक करने की सारी संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं। ऐसे में कैंसर से उत्पन्न पीड़ा व अन्य जटिलताओं को पैलिएटिव केयर के जरिए कम किया जाता है। ताकि मरीज की बची हुई जिंदगी आरामदायक हो और उसकी मृत्यु शान्तिपूर्ण व सम्मानजनक हो। पैलिएटिव केयर में अफीम (मॉर्फिन) की भूमिका सबसे अहम है।
किदवई के निदेशक डॉ. सी. रामचंद्र ने बताया कि पैलिएटिव केयर सिर्फ कैंसर ही नहीं बल्कि एचआईवी-एड्स, जटिल न्यूरोलॉजिकल समस्या जैसी हर ठीक नहीं होने वाली बीमारियों में मददगार साबित होती है। मरीजों के जीवन को बेहतर बनाना और बीमारी से होने वाले दर्द से छुटकारा दिलाना पैलिएटिव केयर का लक्ष्य है।

10-12 किलोग्राम की खपत
किदवई (Kidwai Memorial Institute of Oncology) के पूर्व निदेशक और पैलिएटिव केयर विशेषज्ञ डॉ. के. बी. लिंगेगौड़ा ने बताया कि किदवई सालाना 10-12 किलोग्राम अफीम का इस्तमाल करता है, जो देश में सबसे ज्यादा है। हर वर्ष 1200 नए और 10 हजार से ज्यादा पुराने मरीज केवल मॉर्फिन (Morphine) के लिए किदवई पहुंचते हैं। कैंसर के 80 फीसदी मरीज बीमारी के अंतिम चरण में अस्पताल पहुंचते हैं। कैंसर लाइलाज हो जाता है।

आसान नहीं खरीद
राज्य औषधि नियंत्रक की अनुमति और लाइसेंस के बाद ही मॉर्फिन की खरीद संभव है। पंजीकृत चिकित्सा संस्थानों (आरएमआइ) को जब भी मॉफिन की जरूरत पड़ती है तब वे औषधि नियंत्रक को आवेदन भेजते हैं। जिसे मंजूर करने के बाद औषधि नियंत्रक आगे की प्रक्रिया के लिए इसे राजस्व मंत्रालय को भेज देता है। जिसके बाद नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो आवंटन की पुष्टि करता है। तब जाकर मध्य प्रदेश के नीमच स्थित सरकारी ओपियम एंड अल्कालायड कारखाना मॉर्फिन आवंटित करता है।



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Nikhil Kumar Reporting
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