समता आत्मकल्याण का राजमार्ग है

श्रीरंगपट्टनम में धर्मचर्चा

By: Yogesh Sharma

Published: 31 Jul 2020, 05:04 PM IST

बेंगलूरु. श्रीरंगपट्टनम में दिवाकर गुरु मिश्री राज दरबार में शुक्रवार को मां पद्मावती की आराधना साध्वी डॉ.पद्मकीर्ति ने दीपेश दरला से सोशल मीडिया के माध्यम से करवाई। एकासने का लाभ चंचलबाई, रेखा, संतोष, ज्योति मूथा मैसूरु एवं मांगीलाल, तरुणकुमार, निर्मला सेठिया परिवार की ओर से आज एकासना करवाया गया। साध्वी ने कहा कि समता आत्मकल्याण का राजमार्ग है। क्योंकि जब अपने ही पाप कार्यों द्वारा जो परिणाम, दु:ख और संकट के रूप में हम पाते हैं। उन्हें सहने में यदि समता रखी तो वह पापों का और उनके परिणामों का क्षय हो जाना निश्चित है, जिसके फलस्वरूप हम पुण्य के मार्ग पर अग्रसर होकर आत्मकल्याण की साधना सरलता से कर सकते हैं। समता, तद्भव और परभव, दोनों में उत्तम फलदायी है। समता युक्त जीवन व्यवहार, वर्तमान में इस भव में, हमें सुख, शांति, संप, संपत्ति, सन्मान, सदभाव, समाधि प्राप्त करवाता है और साथ ही भविष्य में भवपार, सद्गति देता है। जीवन में कभी-कभी परिस्थितियों को बदलने का प्रयत्न करने से पहले मन:स्थिति बदलना जरूरी हो जाता है। क्योंकि परिस्थिति कर्म के वश उदय में आती है, मन:स्थिति पुरुषार्थ से उद्भव होती है। हमें पुरुषार्थ, हृदय में समता गुण खिलाने के लिए करना है। मन को सदा समता में रखने का प्रयास करना है। सामने वाले को परिवर्तित करने के प्रयास से पहले समता पूर्वक स्वभाव मे परिवर्तन आवश्यक है। जिस तरह सिक्के को दो तरफ से देखना होता है, जब दो तरह के ज्ञान की प्राप्ति होती है, तब ही सच्ची परख होती है, जैसे जहर की भयंकरता का ज्ञान,अमृत प्राप्ति के लिए प्रवृत्त कर देता है, वैसे ही ममत्व भाव के क्रूर परिणामों की जानकारी हमको समता के घर में ला कर रख देती है। संसार की ममता वह परघर है। मारने वाली है। पतन कराने वाली है। दुध्र्यान में लेकर जाती है। दु:ख के समुद्र में डुबोने वाली है। ये जानकारी जिनको होगी वही उस ममत्वभाव को त्याग कर, समता के घर मे रहकर समता की साधना कर सकतें है। अपनी वृत्ति का निरोध करके अपनी आत्मा को आध्यात्म में ओतप्रोत करने से सम्भाव में वृद्धि होती है। जो सम्भाव में रहता है वही मोक्ष प्राप्त कर सकता है, ये निश्चित है। परमात्मा महावीर ने साढ़े बारह वर्ष समत्वभाव से उग्र साधना की। परमात्मा पाश्र्वनाथ प्रभु ने 10 भव तक समत्वभाव रखा था। गजसुकुमाल मुनि ने समता से केवलज्ञान प्राप्त किया था। चंडकौशिक सम्भाव में आया तो ही 8वें देवलोक में गया। ममत्व भाव की अग्नि को समत्व भाव के जल से ही शांत किया जा सकता है और ये हमें करना ही है, इस अभियान के लिए हम कटिबद्ध बने और स्व-पर कल्याण की दिशा में प्रयाण करें। यह जानकारी समिति के कोषाध्यक्ष मनोज कोठारी ने दी।

Yogesh Sharma Reporting
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