पार्श्व जन्म दीक्षा कल्याणक में गांव सांझी

पाश्र्व जन्म दीक्षा कल्याणक महोत्सव समिति द्वारा आचार्य मुक्तिसागर सूरी की निश्रा में वासुपूज्य स्वामी जैन संघ अक्कीपेट में महिला संगीत, गांव सांझी एवं मेहंदी वितरण का भाव कार्यक्रम संपन्न हुआ।

By: शंकर शर्मा

Published: 30 Dec 2018, 11:17 PM IST

बेंगलूरु. पाश्र्व जन्म दीक्षा कल्याणक महोत्सव समिति द्वारा आचार्य मुक्तिसागर सूरी की निश्रा में वासुपूज्य स्वामी जैन संघ अक्कीपेट में महिला संगीत, गांव सांझी एवं मेहंदी वितरण का भाव कार्यक्रम संपन्न हुआ।


शहर के विभिन्न महिला मंडलों की सदस्याओं ने पाश्र्व प्रभु की भक्ति की। करीबन 1500 महिलाओं ने इस आयोजन में लाभ लिया। जन्म दीक्षा कल्याणक निमित्त विश्व शांति के लिए 1008 अ_म तप तेले के साथ 23 लाख महाभिषेक के लिए हो रहे पाश्र्व भक्ति सप्ताह के तीसरे दिन आयोजित इस कार्यक्रम में प्रभु भक्ति से सराबोर हो रही महिलाओं के समक्ष इस समग्र आयोजन के प्रेरक एवं मार्गदर्शक आचार्य मुक्तिसागरसूरी ने मंगलाचरण के साथ पाश्र्व प्रभु की प्रगट प्रभावी महिमा का सुन्दर वर्णन किया।


उन्होंने कहा कि पाश्र्व प्रभु के बारे में आप को कुछ कहना, माँ के सामने मामा की प्रशंसा करने जैसा हैं। पारस बड़ा प्यारा नाम है। मीठा अमृत सा जाम है। उन्होंने आयोजन में सभी से जुडऩे एवं औरों को भी जोडऩे के लिए प्रेरित किया। इस दौरान रविवार को जयनगर में निकलने वाले वरघोड़े के चढ़ावे भी लगाए गए। कार्यक्रम के लाभार्थी ओटीबाई पुखराज सोनीगरा का आभार जताया गया। महोत्सव आयोजन समिति के इंदरचंद नाहर, नरेश नाहर एवं मिलनभाई सेठ ने बताया कि रविवार को 1008 प्रभु की प्रतिमाओं का वरघोड़ा धर्मनाथ जैन मंदिर से रवाना होकर जयनगर स्थित शालिनी ग्राउंड महोत्सव स्थल पर पहुंचकर धर्म सभा में बदल जाएगा।


परमात्मा की भक्ति मनुष्य को परमात्म तुल्य बनाती है
मैसूरु. महावीर भवन में जैनाचार्य रत्नसेन सूरीश्वर ने धर्मसभा में कहा कि इस अवसर्पिणी काल में हुए चौबीस तीर्थंकरों के जीवन में पंच कल्याणक रुप विशेषताएं सभी में एक समान है। उनके माता की गर्भ में आते माता १४ महास्वप्न देखती हंै।

जन्म होने के बाद उन्हें इंद्र महाराज पांच रुप करके असंख्य देवताओं के साथ एक लाख योजन ऊंचे मेरु पर्वत पर ले जाकर, एक करोड़ साठ लाख कलशों से जन्माभिषेक करते हैं। मन वचन और काया की एकाग्रता से की हुई परमात्मा की भक्ति हमें परमात्म तुल्य बनाती है। फिर भी अनादिकाल के कुसंस्कारों के कारण वचन और काया का समर्पण तो खूब आसान है, परंतु मन का समर्पण करना अत्यंत ही कठिन है।

जीवन निर्वाह के लिए नहीं, निर्वाण के लिए जीना चाहिए
बेंगलूरु. राजाजीनगर में साध्वी जयश्री ने प्रवचन में कहा कि संसार की अनंत आत्माएं इस संसार में जीवन निर्वाह के लिए जीवन जी रही है। जिनका लक्ष्य केवल जीवन की गाड़ी को धक्का देना है। कुछ ऐसी आत्माएं है जो जीवन का निर्माण करना चाहती है। जिनका लक्ष्य कि हम कुछ न कुछ बन जाएं। लेकिन, इस संसार में बहुत कम आत्माएं जो जीवन का निर्वाण करना चाहती है। संसार के प्रपंच से मुक्त होना चाहती है, क्योंकि उसके लिए प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता है।

शंकर शर्मा
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