मानसिक रूप से बीमार कर रहे मोबाइल गेम

मानसिक रूप से बीमार कर रहे मोबाइल गेम
मानसिक रूप से बीमार कर रहे मोबाइल गेम

Nikhil Kumar | Publish: Sep, 20 2019 05:05:54 PM (IST) Bangalore, Bangalore, Karnataka, India

Mobile Games चिकित्सकों और अभिभावकों के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। शहर से ग्रामीण इलाकों तक इनके दुष्प्रभाव दिख रहे हैं। गेम की लत बच्चों, किशोरों और युवाओं के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रही है। अधिकतर समय गेम खेलने से होने वाली समस्याओं को विशेषज्ञों ने 'मानसिक स्वास्थ्य अवस्था - Mental health Condition' के नाम से परिभाषित किया है।

-आठ माह में निम्हांस में सामने आए 120 मामले, 99 फीसदी लड़के

-ज्यादातर प्रभावितों की आयु 15-20

निखिल कुमार

बेंगलूरु.
लत के शिकार लोगों में नींद व भूख की कमी, वास्तविक जीवन में कम रुचि, खेलने से रोकने पर हिंसक व्यवहार व पढ़ाई पर बुरे असर जैसे तथ्य पहले तो एक दो व्यक्तियों तक ही सीमित थे। मगर अब बड़े पैमाने पर इसका दुष्प्रभाव दिख रहा है। कई लोग रोज आठ-आठ घंटे गेम खेलते हुए व्ययतीत कर रहे हैं। गेम शुरू करने के बाद इनका खुद पर नियंत्रण नहीं रहता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि खेल की प्रतिस्पर्धात्मक प्रकृति Players य़ों को घंटों खेलते रहने पर मजबूर कर रही है। लोगों को खाने, सोने और नहाने तक की परवाह नहीं रहती। बच्चों की यह स्थिति अभिभावकों को परेशान कर रही है। कुछ मामलों में तो चिकित्सकों को बच्चों सहित अभिभावकों का भी उपचार करना पड़ रहा है।

बनाना चाहते हैं करियर
चिंताजनक पहलू यह है कि बच्चे केवल गेम ही नहीं खेल रहे हैं, बल्कि इसे करियर के रूप में भी देख रहे हैं। Counselling के दौरान कुछ बच्चों ने बताया कि वे इसमें भविष्य बनाना चाहते हैं। बेहतर खिलाड़ी बनकर ज्यादा से ज्यादा पैसा कमा सकें इसलिए वे घंटों तक इसमें व्यस्त रहते हैं। उन्हें लगता है कि उन्हें खिलाड़ी या Game Developer के तौर पर नौकरी मिल जाएगी।

फोन पर भी परामर्श

National Institute Of Mental Health And Neuro Sciences (NIMHANS) में डिजिटल लत छुड़ाने की क्लिनिक SHUT (सर्विस फॉर हेल्दी यूज ऑफ टेक्नोलॉजी - Services For Healthy Use Of Technology) चला रहे क्लिनिकल साइकोलॉजी विभाग के एडिशनल प्रोफेसर Dr. Manoj Kumar Sharma ने बताया कि लत के साथ मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है। गत तीन माह में 120 से ज्यादा अभिभावक अपने बच्चों के उपचार के लिए पहुंचे हैं। कई अभिभावक फोन पर भी परामर्श लेते हैं। मरीजों में कई Chennai, Hyderabad, Delhi, Pune और Mumbai आदि शहरों से हैं। 99 फीसदी मरीज Boyas हैं।

बढ़ता एकाकीपन
डॉ. शर्मा ने बताया कि लोगों के बीच मौखिक संवाद घटा है। रिश्तों में खटास आई है। लोग चिड़चिड़े हो चले हैं। शैक्षिक, सामाजिक और मनोरंजक गतिविधियों से लोग कट रहे हैं। एकल परिवार के ज्यादातर लोगों में Internet, Social Media और Mobile गेम की लत अधिक है। अभिभावक भी इसके लिए कुछ हद तक जिम्मेदार हैं। परिवार के बीच के लोगों में ही संवाद का समय नहीं बचा है। चाय-नाश्ता या फिर एक साथ बैठकर कम-से-कम रात के भोजन का चलन खत्म सा हो गया है।

Digital Addiction के लक्षणों को समझना इसके प्रबंधन की दिशा में पहला कदम है। तनाव, खराब पारिवारिक माहौल, बच्चों पर अत्यधिक दबाव, माता-पिता द्वारा बच्चों की अनदेखी आदि कारणों से भी बच्चे हर उस वस्तु या गेम की ओर आकर्षित हो जाते हैं, जिनसे उन्हें खुशी मिलती हो।

हर माह 40 मरीज, त्वरित उपचार नहीं
डॉ. शर्मा बताते हैं कि भारत में करीब आठ माह पहले PUBG गेम ने दस्तक दी थी। पहले तीन माह में हर माह दो से तीन मरीज ही आते थे। लेकिन Bengauru में आयोजित प्रतियोगिता के बाद से बड़ी संख्या में लोग इसके शिकार हो रहे हैं। हर माह करीब 40 मरीज सामने आ रहे हैं। गेमिंग एडिक्ट्स मानसिक स्वास्थ्य अवस्था नामक विकार से पीडि़त होते हैं। इसमें मानसिक स्थिति बिगड़ जाती है। इसका कोई त्वरित उपचार नहीं है। उपचार के दौरान समय और धैर्य की जरूरत है। जो आजकल हर वर्ग के लोगों में वैसे ही कम है। लत के शिकार लोगों से एक ही झटके में Mobile छीन लेने से समस्या का समाधान संभव नहीं है। ऐसे लोगों को धीरे-धीरे जागरूक करना पड़ेगा। उपचार में काउंसलिंग और Therapy की भूमिका अहम है। बच्चों की ऐसी मानसिक स्थिति के प्रभाव में कई बार अभिभावक भी आ जाते हैं। ऐसे मामलों में अभिभावकों को भी चिकित्सकीय हस्तक्षेप की जरूरत पड़ती है।

तथ्य ये भी
-पबजी के अलावा और भी ऐसे कई गेम हैं, जिनमें खिलाडिय़ों को मानसिक तौर पर बीमारी बनाने की क्षमता है। ऐसे गेम लोग खूब खेल रहे हैं। बच्चों से मोबाइल ले लिया जाता है या उन्हें गेम खेलने से मना करते हैं तो कई बच्चे चिड़चिड़ाहट और गुस्सा दिखाते हैं।
कई परिजनों ने यह स्वीकारा है कि हिंसक गेम खेलने से उनके बच्चों के व्यवहार में बदलाव आया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी गेम खेलने की लत को एक मानसिक बीमारी बताया है।

-लत के शिकार लोग बाहरी दुनिया सहित परिजनों से भी कट रहे हैं। उन्हें लगता है कि गेम ही उनकी दुनिया है। और उनके और गेम के बीच में आने वाला हर व्यक्ति उनका दुश्मन। बेंगलूरु शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज ने कॉलेज के छात्रावास में इस गेम को प्रतिबंधित किया है।

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