अंग्रेजी माध्यम सरकारी स्कूल शुरू नहीं करने का अनुरोध

कृषि विश्वविद्यालय परिसर में चल रहे 84वें अखिल भारतीय कन्नड़ साहित्य सम्मेलन के अंतिम दिन पांच प्रस्ताव पारित किए गए। सम्मेलन में सरकारी अंग्रेजी मीडियम स्कूल शुरू करने के विचार को वापस लेने का भी राज्य सरकार से अनुरोध किया गया।

By: Santosh kumar Pandey

Published: 07 Jan 2019, 07:38 PM IST

अखिल भारतीय कन्नड़ साहित्य सम्मेलन
धारवाड़. कृषि विश्वविद्यालय परिसर में चल रहे 84वें अखिल भारतीय कन्नड़ साहित्य सम्मेलन के अंतिम दिन पांच प्रस्ताव पारित किए गए। सम्मेलन में सरकारी अंग्रेजी मीडियम स्कूल शुरू करने के विचार को वापस लेने का भी राज्य सरकार से अनुरोध किया गया।

सम्मेलन के समापन पर कन्नड़ साहित्य परिषद के मानद कोषाध्यक्ष पी. मल्लिकार्जुनप्पा ने सम्मेलन में पारित प्रस्तावों की जानकारी दी। यह कहा गया कि सरकार को राष्ट्रकवि कुवेंपु की ओर से रचित प्रांतगीत की अवधि को अधिकतम दो मिनट 30 सेकंड निर्धारित करना चाहिए।

राज्य सरकार की ओर से आगामी शैक्षणिक वर्ष से एक हजार अंग्रेजी स्कूलों को आरम्भ करने के फैसले को लागू नहीं करना चाहिए। केंद्र सरकार की ओर से संचालित सभी स्पर्धात्मक परीक्षाओं को कन्नड़ में भी लिखने का मौका देना चाहिए। एलकेजी से सातवीं कक्षा तक प्राथमिक शिक्षा का राष्ट्रीयकरण करना चाहिए। पूर्व में आयोजित अखिल भारतीय कन्नड़ साहित्य सम्मेलनों में सुगम संगीत के लिए पृथक गोष्ठियां होती थीं परन्तु लगभग दो वर्ष से ये गोष्ठियां नहीं हो रही हैं। कन्नड़ साहित्य परिषद के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. मनु बलिगार को इस प्रकार की मानसिकता प्रदर्शित करना सही नहीं है।

कन्नड़ साहित्य सम्मेलन के उपलक्ष्य में कृषि विश्वविद्यालय परिसर के प्रेक्षागृह में आयोजित काव्य संगोष्ठी के दौरान कन्नड़ साहित्य सम्मेलनों में सुगम संगीत के लिए पृथक गोष्ठियां नहीं होने की बात पर साहित्यकारों ने नाराजगी जताई। साहित्यकारों ने कहा कि केवल गोष्ठियों में मात्र नहीं साहित्य सम्मेलन के सभी मंचों में सम्मेलन के सर्वाध्यक्ष के साथ कसाप प्रदेशाध्यक्ष के फोटो को लगाने की पध्दति जारी की है जो सही नहीं है। यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि यह कन्नडिग़ाओं का त्योहार है। इसके चलते प्रदेशाध्यक्ष को इस मानसिकता को त्यागना चाहिए। बीआर लक्ष्मणराव ने कहा कि काव्य प्रचार में संगीत की भूमिका क्या है इसे जानना यह बेहद जरूरी है। काव्य तथा संगीत का अटूट संबंध है। शुध्द शास्त्रीय संगीत को साहित्य की जरूरत नहीं है। अमर कवि पंपा, रन्ना, कुमारव्यास, कुवेंपु की रचनाएं अभी भी जनता के मन में हैं। श्रेष्ठ काव्य जनता तक पहुंचने में गमक साहित्य जरूरी है। सुगम संगीत के लिए कविता की जीवनी है। कविता को जनता तक पहुंचाने का कार्य सुगम संगीत कर रहा है। आज के युग में सोशल मीडिया का इस्तेमाल अधिक होने से सीडियों का मोल ही नहीं रहा है। इसी कारण से रिकार्डिंग के लिए कम्पनियां आगे नहीं आ रही हैं। बिक्री व्यवस्था भी नहीं है। सुगम संगीत, गमक को नया आयाम तलाश कर प्रचार की ओर ध्यान देना चाहिए।

वाई.के. मुद्दुकृष्णा ने कहा कि सुगम संगीत को एक के तौर पर समीक्षा करने पर 20वीं सदी का शिशु कह सकते हैं। इसके बाद नित्योत्सव सीडी के लोकार्पण के साथ सुगम संगीत अग्रिम पंक्ति में आ गया। संगीतकार सी. अश्वत्थ में सुगम संगीत की दीवानगी अधिक थी। इसके चलते 14 जिलों में सुगम संगीत का प्रचार किया था। कविताओं को आज भी अत्यधिक लोग लिखते हैं परन्तु संगीत संयोजन करने की रचनाएं बहुत कम हैं।

Santosh kumar Pandey Desk
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