सागरमल ने मृत्यु को सहज स्वीकार किया: ज्ञानमुनि

विजयनगर में प्रवचन

By: Santosh kumar Pandey

Published: 20 Jul 2020, 09:51 PM IST

बेंगलूरु. ज्ञानमुनि ने कहा कि जहां जन्म है, वहां मृत्यु है। संयोग है, वहां वियोग है। यह संसार का क्रम है। किंतु संसार के सभी प्राणी जन्म के साथ मृत्यु से भागते हैं। मृत्यु से डरते हैं।

कुछ साधक होते हैं जो जन्म-मृत्यु से सम्भाव पूर्वक आचरण करते हैं। ऐसे ही एक महान साधक स्वर्गीय सागरमल हुए। उन्होंने जन्म के साथ मृत्यु को भी सहज रूप से धारण किया। वे जयपुर के माने हुए प्रतिष्ठित जौहरी थी। उन्होंने २७ वर्ष की उम्र में दीक्षा ली। आचार्य शोभाचंद के वे परम और लाडले शिष्य थे। मात्र 43 वर्ष की अवस्था में उन्हेंं शरीर में असमाधि हुई। ऐसा लगा कि वे कुछ दिनों के ही हैं।

तक उन्होंने हंसते-हंसते मृत्यु को ग्रहण करने के लिए देह से हट गए विदेह की साधना करने लग गए। आत्मध्यान करने लग गए। उन्होंने संथारा ले लिया। 59 दिन का संथारा उनको आया। ५९ दिन के संथारे में भी आत्मभाव में रमण करते रहे। देह में होते हुए भी देहातीत हो गए।

उन्होंने कहा कि ऐसे महान संत की स्मृति में आज भी किशनगढ़ में सागर विद्यालय आज भी संचालित है।
उन्होंने कहा कि काश हमारे मन में भी मृत्यु को जीतने का संकल्प पैदा हो। हम उपाध्याय सागरमल की तरह मृत्यु का स्वागत करने के लिए तत्पर रहें। जब भी आए हंसते-हंसते, प्रार्थना करते-करते भगवती स्मरण करते हुए मौत का आलिंगन करें, यह प्रेरणा सागरमल से ली जा सकती है।

Santosh kumar Pandey Desk
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