सम्यक दर्शन मोक्ष महल की प्रथम सीढ़ी : आचार्य देवेंद्र सागर

राजाजीनगर में पौष दशमी पर्व

By: Santosh kumar Pandey

Published: 10 Jan 2021, 02:51 PM IST

बेंगलूरु. राजाजीनगर के सलोत जैन आराधना भवन में आचार्य देवेंद्र सागर सूरी ने पौष दशमी पर्व के तीसरे दिन धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि चारित्र जीवन की सबसे बड़ी निधि है। आचार को धर्म कहा गया है। धर्म का क्रियात्मक रूप आचार है।

आचार को एक निश्चित विचार से अभिप्रेरित होना चाइए। विचार रहित आचार और आचार रहित विचार हमें वांछित परिणाम नहीं दे सकता। आचार और विचार की इसी अन्योन्ययाश्रिता के कारण ही जैन धर्म में सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान और सम्यक चारित्र की एकरूपता को रत्नत्रय धर्म कहा है।

उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में आचरण का बहुत बड़ा महत्व है। यदि चरित्र को संभाल लिया तो जीवन संवर जाएगा।
उन्होंने कहा कि सम्यक दर्शन धर्म का मूल स्तम्भ है। सम्यक दर्शन के अभाव में न तो ज्ञान सम्यक होता है और न चारित्र। इसलिए सम्यक दर्शन को मोक्ष महल की प्रथम सीढ़ी कहा गया है।

यह हमारी विचार शुद्धि का आधार है। आचार की विशुद्धि के लिए विचार की शुद्धि अनिवार्य है। सम्यक दर्शन और सम्यक चारित्र में अंक और शून्य का सम्बन्ध है। चाहे जितने भी शून्य हों, अंक के अभाव में उनका कोई महत्व नहीं होता। सम्यक दर्शन अंक है और सम्यक चारित्र शून्य। प्रवचन के तहत आचार्य की निश्रा में प्रभु पाश्र्वनाथ भगवान के दीक्षा कल्याणक निमित्त उपकरण वंदनावली हुई, जिसमें श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया।

Santosh kumar Pandey Desk
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