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स्वयं की पहचान लोक कल्याण के लिए होनी चाहिए

आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने कहा

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स्वयं की पहचान लोक कल्याण के लिए होनी चाहिए

स्वयं की पहचान लोक कल्याण के लिए होनी चाहिए

बेंगलूरु. राजस्थान जैन मूर्ति पूजक संघ जयनगर में नवपद ओली की आराधना के लिए विराजित आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने कहा कि समझ और ज्ञान आसमान में एक तारे की तरह है, जो पहली बार में तो दिखाई नहीं देता, पर गौर करने पर साफ टिमटिमाता हुआ चमकता सा नजर आ जाता है। एक मिथक कथा है कि फीनिक्स नामक एक पक्षी है। वह गाता है तो उसके पंखों से आग निकलती है और उस आग से वह पक्षी जल कर राख हो जाता है। मगर उस राख पर जब अंबर से बारिश की एक बूंद गिरती है तो वह फीनिक्स अपनी ही राख से वापस जीवित भी हो जाता है। दरअसल यह पहचान भी एक फीनिक्स पक्षी ही है, जो अपने संघर्ष और जुझारूपन की राख से पुनर्जीवित हो जाती है और कायम रहती है। संसार में एक सही पहचान इसलिए जरूरी है, क्योंकि वह हमें तृप्त करती है। जिस समर्पण से हमने अपना जीवन जिया, हमारी पहचान हमें उसी समर्पण से जोड़ देती है। हर मनुष्य के मन और आत्मा में एक अमृत कलश होता है। उस कलश में जो लबालब पानी भरा रहता है, वह उत्साह और उमंग का पावन नीर है। यही हमारे कामों को जिद के साथ पूरा करा देता है और जब वह काम एक दास्तान बन जाती है, तब समाज में पहचान बनती है। जैसे शिवा को छत्रपति शिवाजी महाराज की पहचान उनके समझ भरे कामों ने ही दिलवाई। वरना उनके दौर में और भी योद्धा थे, पर एक शिवा का निरंतर समर्पण ही उस समय के समाज के मन को छू गया था। आज पांच सौ साल बाद भी वह अनुकरणीय है। वैसे तो संसार में हर कोई अपनी ऊर्जा और सूझ-बूझ के मुताबिक ही काम कर रहा है, पर बहुत सारे लोग बेकार साबित हो जाते हैं, क्योंकि उनके कठिन परिश्रम में बस लोभ, लालसा और उनका निजी स्वार्थ ही हावी रहता है। इसलिए महापुरुष सही कहते हैं कि विचारों पर गौर करना चाहिए। यह विचार हमेशा दो मुंहे होते हैं। एक तो बस मेरा-मेरा और मैं-मैं कहता है, और दूसरा विचार भीतर तक की यात्रा करता है। यह दूसरा विचार पहले लोक कल्याण की सोचता है। द्रोपदी के मन में पहले विचार ने ही तो मुखरित होकर तांडव किया और दूसरे विचार को दबा दिया। दुष्परिणाम यह हुआ कि द्रौपदी के मन से निकला विचार और द्रौपदी की यह पहचान स्थायी हो गई कि उसी ने महाभारत का घोर युद्ध करा दिया। इसके विपरीत मर्यादा पुरुषोत्तम राम के एक विचार ने अरण्य में भी जीवन खोज लिया। लौकिक जगत भी ऐसा ही है। यहां जीवन काट देना तो फिर भी आसान है, पर गुणवत्ता से भरा जीवन जी लेना एक पहचान और मिसाल की बात है।