कांग्रेस के अंदरूनी मामलों में टांग न अड़ाए जद-एस : गुंडूराव

प्रदेश कांग्रेस ने अपने सहयोगी घटक दल जद-एस से कहा है कि वह पार्टी के आंतरिक निर्णयों पर बयान देने से बचें।

By: शंकर शर्मा

Published: 30 Dec 2018, 10:43 PM IST

बेंगलूरु. प्रदेश कांग्रेस ने अपने सहयोगी घटक दल जद-एस से कहा है कि वह पार्टी के आंतरिक निर्णयों पर बयान देने से बचें। उप मुख्यमंत्री डॉ. जी.परमेश्वर से गृह विभाग लिए जाने पर एचडी रेवण्णा ने बयान दिया। रेवण्णा ने कहा था कि परमेश्वर से गृह विभाग छीना जाना तार्किक नहीं है। कांग्रेस को एक दलित नेता का उपमुख्यमंत्री बनना पसंद नहीं आ रहा है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दिनेश गुंडूराव ने इसपर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि रेवण्णा की बयानबाजी अनावश्यक है। परमेश्वर के साथ क्या हुआ यह पार्टी का विशेषाधिकार है। उन्हें कांग्रेस के निर्णयों पर चिंता क्यों हो रही है। वहीं राजस्व मंत्री आरवी देशपांडे ने भी रेवण्णा के बयान पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि जद-एस ने कितने दलितों को मंत्री बनाया है।


दरअसल, हाल के मंत्रिमंडल विस्तार और बोर्ड निगम के अध्यक्ष पदों पर नियुक्ति के बाद गठबंधन में मनमुटाव बढ़ा है। कांग्रेस के एक कैबिनेट मंत्री ने कहा कि जद-एस के लिए पार्टी ने अपना काफी जनाधार खोया है। जद-एस को लगता है कि गठबंधन चलाने की जिम्मेदारी कांग्रेस पर है क्योंकि कांग्रेस आलाकमान ऐसा चाहता है। जद-एस इसका फायदा उठा रही है और अवसर का लाभ का कोई भी मौका नहीं छोड़ती है। कांग्रेस को भी अब और मुखर होना होगा। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक जद-एस ने 70-8 0 ऐसे विधानसभा क्षेत्रों पर नजरें टिका रखी हैं जहां कांग्रेस मजबूत है। जद-एस यहां अपना पांव मजबूती से पसार रही है। सत्ता में आने के बाद उनकी विस्तार योजना बहुत तीव्र गति से चल रही है।


कांग्रेस के एक पार्षद ने कहा कि लोकसभा चुनावों तक 3-4 महीने ऐसे ही चलना होगा। कांग्रेस की रणनीति यह है कि उत्तर भारत में जो भाजपा विरोधी लहर पैदा हुई है कर्नाटक में उसका पूरा लाभ उठाने के लिए उसे जद-एस के साथ लोकसभा चुनाव लडऩा होगा। इसलिए विधायकों को कहा गया है कि वे तैयार रहें।

कौन जानता है लोकसभा चुनावों के बाद क्या होगा। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार तमाम विवादों के बावजूद लोकसभा चुनावों तक कुछ नहीं होगा। बोर्ड निगमों के अध्यक्ष पदों की निुयक्ति को लेकर जो विवाद है वह एक- दो पदों तक ही सीमित है। कर्नाटक राज्य प्रदूषण बोर्ड और राज्य योजना आयोग के उपाध्यक्ष पद को लेकर सहमति नहीं है। अन्यथा बाकी विभागों का आवंटन दोनों पार्टियों की सहमति से ही हुआ है।

शंकर शर्मा
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