ऐसा व्यवहार करना चाहिए, जो वास्तव में जन-हित साधक हो

धर्मसभा में कहा आचार्य देवेन्द्र सागर ने

बेंगलूरु. बसवनगुड़ी में स्थिरता के दौरान आचार्य देवेंद्रसागर ने कहा कि अक्सर कहा-सुना जाता है कि कर भला, हो भला, अंत भला तो सब भला। परंतु जीवन और संसार में क्या भला और बुरा है, क्या पुण्य है और क्या पाप है। इस संबंध में कोई भी व्यक्ति अंतिम या निर्णायक रूप से कुछ नहीं कह सकता। मेरे लिए जो वस्तु भक्ष्य है, स्वास्थ्यप्रद और हितकर है, वही दूसरे के लिए अभक्ष्य, अस्वास्थ्यकर और अहितकर हो सकती है। मुझे जो चीज या बात अच्छी लगती है वही दूसरे को बुरी भी लग सकती है, पर यदि हम यही मानकर मनमानी करने लेंगे, अपने आसपास रहने वालों की इच्छा-आकांक्षा या भावना का ध्यान न रखें, तब भला यह जीवन और समाज कैसे ठीक ढंग से चलकर विकास कर सकता है। निश्चय ही हर मनुष्य की अपनी इच्छा-आकांक्षा के साथ-साथ पूरे समाज का भी ध्यान रखना पड़ता है। इसी में अपना तथा सबका भला हुआ करता है। हो सकता है, पहले-पहले हमें ऐसा सब करते समय अच्छा न भी लगे, पर निरंतर अभ्यास से, उस सबका परिणाम देखकर आज का बुरा अच्छा भी लग सकता है। वस्तुत: अच्छा या भला वही हुआ करता है जो आरंभ में बुरा लगकर भी अंत में भला लगे या भला परिणाम देखकर आज का बुरा अच्छा भी लग सकता है। वस्तुत: अच्छा या भला वही हुआ करता है, जो आरंभ में बुरा लगकर भी अंत में भला लगे या भला परिणाम लाए। जिसे करके पछताना न पड़े और सभी का भला संभव हो सके। इस कहावत का सार-तत्व यही स्पष्ट करना है। उदाहरण के लिए, हम कड़वी दवाई, नीम या आंवले को ही ले सकते हैं। दवाई खाई नहीं जाती, अपनी कड़वाहट के कारण नीम पी नहीं जाती, कसैलेपन के कारण आंवला खाया नहीं जाता, पर सभी जानते हैं कि इनके सेवन का परिणाम अंत में भला ही सामने आता है। आंवले को अमृतफल इसी कारण कहा गया है कि उसका अंतिम परिणाम बड़ा सुखद होता है और बाद में ही मालूम पड़ा करता है। इसी प्रकार मानव होने के नाते कई बातें रुचि के अनुकूल न होने के कारण, अनुकूल न लगने पर भी हमें इसी कारण करनी या निभानी पड़ती है कि उनका अंतिम परिणाम सारे मानव समाज के लिए भला होने की आशा हुआ करती है। यह आशापूर्ण व्यवहार ही जीवन-संसार में संतुलन बनाए हुए हैं। अत: ऐसा व्यवहार करना चाहिए, जो वास्तव में जन-हित साधक हो। वे आगे बोले की वस्तुत: भला वही, जो परिणामस्वरूप हमें प्राप्त होता है। कोई विद्यार्थी सारा साल मेहनत करता है, तब कहीं जाकर वह उसका अंतिम फल परीक्षा में सफलता के रूप में प्राप्त कर पाता है। वैसे भी आज किए का फल आज ही प्राय: नहीं मिला करता। उसके लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। फिर क्यों न हम कर्तव्य कर्मों को कर्तव्य मानकर, अनुशासित रहकर करते चलें, ताकि अंत में हमें हाथ मल-मलकर पछताना न पड़े। हमारे साथ सभी का भला हो। कोई भी मनुष्य जन्मजात स्वभाव से बुरा नहीं होता, बहुत ही बुद्धिमान एवं सूझ-बूझ वाला होता है। पर कई बार यह तात्कालिक लाभ के लिए, तुच्छ स्वार्थ के लिए भटक भी जाया करता है। ऐसे ही लोगों के लिए ‘अंत बुरा’ कहा गया है।

Yogesh Sharma
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