श्रीकृष्ण का जीवन सद्गुणों की सौरव से सुवासित था


कृष्ण के जीवन से सबक लें

By: Santosh kumar Pandey

Published: 13 Aug 2020, 11:08 PM IST

बेंगलूरु. विजयनगर में चातुर्मास कर रहे ज्ञानमुनि ने कहा कि कृष्ण जन्माष्टमी पर जरासंध के अत्याचारों से पृथ्वी कांप रही थी। दुर्योधन और शिशुपाल जैसे मादांध व्यक्तियों से जनता का उत्पीडऩ बढ़ रहा था। ऐसी विकट बेला में श्रीकृष्ण का जन्म कंस के कारागृह में देवकी से हुआ था। उनके जन्म के पश्चात कंस के पहरेदारों को नींद आ गई, जेल के ताले टूट गए और विराट पुरुष को अपना रास्ता प्राप्त हो गया। वे सकुशल नंद यशोदा के घर पहुंचा दिए गए।

उनका बचपन हंसी खुशी आमोद-प्रमोद में बृज भूमि में बीता। किशोरावस्था में उन्होंने दुष्ट कंस को समाप्त कर पृथ्वी को अत्याचारों से मुक्त कराया। अपने दृढ़ अनुशासन से जर्जर भारत भूखंड को एकसूत्र में पिरोया। श्रीकृष्ण का जन्म विलक्षण था। उनके जन्म के समय माता-पिता के सिवाय कोई भी पास नहीं था। देहसमवरण के समय भी जंगल में कोई नहीं था। ऐसे वे मुरलीधर सुदर्शन चक्रधारी थे।

ज्ञानमुनि ने कहा कि जो लोग ये सोचते हैं कि हम परिस्थिति वश लाचार हैं कुछ भी नहीं कर सकते हैं ऐसे लोगों को कृष्ण के जीवन से शिक्षा लेकर अपने आप को कर्मठ बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बने बनाए रास्ते पर चलना कौनसी बुद्धिमता है। स्वयं ही अपने रास्ते का निर्माण कर चलने में कौशल है।

अपना रास्ता स्वयं बनाना ही चातुर्य है। गीता में श्रीकृष्ण ने काम करते चलो, फल की तरफ मत देखो का संदेश दिया है। श्रीकृष्ण सम्राट तो थे ही सम्राट के साथ लोक पुरुष थे। वे जन-जन के प्रिय थे। श्रीकृष्ण का जीवन सद्गुणों की सौरव से सुवासित था।

Santosh kumar Pandey Desk
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