सोच बिगड़े तो जीवन बिगड़ते देर नहीं लगती: डॉ. समकित मुनि

शूले जैन स्थानक में प्रवचन

By: Santosh kumar Pandey

Updated: 24 Jul 2020, 10:03 AM IST

बेंगलूरु. अशोकनगर शूले के जैन स्थानक में गुरु निहाल सुमति दरबार में डॉ. समकित मुनि ने समकित की यात्रा के अंतर्गत बत्तीस शुभ योग संग्रह में समकित के सूत्र की व्याख्या की।

उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में सम्यक दर्शन को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। समकित की यात्रा सम्यक दर्शन( सम्यक दर्शन) तब शुरू होती है जब हमारी सोच में बदलाव आ जाता है। समकित यात्री स्वयं को पाप से निवृत कर लेता है। वह यदि पाप करता है तो भी उसे अच्छा नहीं समझता, पश्चाताप करता है।
चौदह गुणस्थानों में चौथे स्थान की विशेषता बताते हुए मुनि ने कहा कि जिस आत्मा ने चौथे गुणस्थान को स्पर्श कर लिया वह चौदहवें गुण स्थान का स्पर्श करेगा ही। चौथे गुणस्थान वाला जीव प्रत्याखान ग्रहण नहीं करता परंतु सोच में परिवर्तन आने के कारण वह भगवान बनने के रास्ते पर चल पड़ता है। बोलने से ज्यादा सोचने का महत्व है। बोलकर कम सोचकर अधिक पाप अर्जित किया जाता है। तीन प्रकार की सोच है मिथ्या ,मित्र, सम्यक्त्व।

चौथे गुणस्थान वालों की सोच सही (सम्यक्तव) हो जाती है। सोच सही होना यानी जीवन सही होना। सोच बिगडऩे के साथ जीवन बिगड़ते समय नहीं लगता।

मुनि ने कहा कि अपने भाव दुआ के रखो क्योंकि हमारे भाव दूसरों को प्रभावित करते हैं। सोच यदि बेकार है तो अच्छे से अच्छा वातावरण भी हमें सुख प्रदान नहीं कर सकता। याद रखें, अंत में जीत अच्छाई की होती है।
संचालन संघ के मंत्री मनोहर लाल ने किया। प्रचार-प्रसार चेयरमैन प्रेम कुमार कोठारी ने बताया कि महावीर चोपड़ा, इंदरचंद भंसाली, चंद्राबाई चोपड़ा, आशा बाई कोठारी आदि उपस्थित थे।

Santosh kumar Pandey Desk
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