चीनी मीठी,गन्ना कड़वा

राज्य में गन्ना उत्पादक किसानों का आंदोलन सरकार के लिए परेशानी का सबब बन चुका है। गठबंधन सरकार किसान हितैषी छवि बचाने के लिए जूझ रही है तो विपक्ष आक्रामक है।

By: शंकर शर्मा

Published: 25 Nov 2018, 11:27 PM IST

बेंगलूरु. राज्य में गन्ना उत्पादक किसानों का आंदोलन सरकार के लिए परेशानी का सबब बन चुका है। गठबंधन सरकार किसान हितैषी छवि बचाने के लिए जूझ रही है तो विपक्ष आक्रामक है। किसानों और चीनी मिलों की लड़ाई अब राजनीतिक हो चुकी है। किसान इस विवाद में मुख्यमंत्री को लाने में सफल रहे हैं।

सत्तापक्ष और विपक्ष की राजनीतिक लड़ाई के बीच गन्ना उत्पादक किसान रहे हैं। चीनी की मिठास गन्ना उत्पादकों के लिए कड़वी हो चुकी है। चीनी उद्योग पर हर दल के नेताओं का नियंत्रण इस समस्या के समाधान में बड़ा अवरोध है। भाजपा किसानों के समर्थन में सडक़ से सदन तक संघर्ष का ऐलान कर चुकी है लेकिन उसके नेताओं की चीनी मिलों पर भी बकाया है।


१४ दिन में करना होता है भुगतान
चीनी नियंत्रण कानून के मुताबिक चीनी मिलों को गन्ना खरीदने के १४ दिन में किसानों को भुगतान करना होता है अन्यथा उन्हें ब्याज के साथ बकाया राशि देनी पड़ती है। लेकिन, राज्य के उत्पादकों को बकाया भुगतान के लिए सडक़ पर उतरना पड़ रहा है। दो महीने पहले भी किसानों ने धरना-प्रदर्शन किया था लेकिन पिछले सप्ताह किसानों का आंदोलन उग्र होने पर सरकार इस मसले पर गंभीर हुई। मामला अब भी बैठकों और सरकारी आदेशों में उलझा हुआ है और किसान भुगतान का इंतजार करने को विवश हैं। हालांकि, सरकार बेलगावी में १० दिसम्बर से विधानमंडल के शीतकालीन अधिवेशन से पहले इसका समाधान तलाश लेना चाहती है।


यह पहला मौका नहीं है जब किसान इस तरह सडक़ पर उतरे हैं। सिद्धरामय्या सरकार के समय भी वर्ष २०१३ में गन्ना उत्पादक किसानों ने बेलगावी में अधिवेशन के दौरान सुवर्ण विधानसौधा का घेराव किया था और एक किसान ने आत्महत्या कर ली थी।


बकाया राशि को लेकर भी संशय
चीनी मिलों के पास किसानों की बकाया राशि को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है। सरकार के आंकड़े मेंं भी समानता नहीं है। उद्योग मंत्री के.जे. जार्ज ने पहले ५८ करोड़ रुपए चीनी मिलों के पास बकाया होने की बात कही थी। बाद में मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी ने कहा कि अगर केंद्र सरकार की ओर से तय एफआरपी २५५० रुपए प्रति टन (९.५ फीसदी रिकवरी दर, हर अतिरिक्त रिकवरी प्रतिशत पर भाव में २५५ रुपए प्रति टन की वृद्धि) की दर से गणना करें तो चीनी मिलों के पास सिर्फ ३८ करोड़ रुपए (चालू पेराई सत्र को छोडक़र) ही बकाया है, जबकि गन्ना उत्पादक किसानों का दावा है कि मिलों के पास करीब ४५० करोड़ रुपए का बकाया है।

किसानों की इस गणना में वह अतिरिक्त राशि भी शामिल है जो चीनी मिलों ने एफआरपी के अलावा देने की बात कही थी। हालांकि, किसान नेता यह स्वीकारते हैं कि कई जगह इसके लिए दोनों पक्षों के बीच लिखित समझौता नहीं था। इस बार गन्ना किसानों के आंदोलन का असर यह हुआ कि निजी चीनी मिल मालिकों ने यह तय किया है मिलें एफआरपी से अलग-अलग दरें नहीं देंगी और सभी मिलें एक कीमत तय कर उसकी का भुगतान किया जाएगा। गन्ना उत्पादक और किसान नेता भी दोनों बैठकों के परिणाम से ज्यादा संतुष्ट नहीं हैं। हालांकि, गठबंधन सरकार नई सरकारी चीनी मिलें स्थापित करने की संभावनाएं भी टटोल रही हैं।

आंकड़ों में खुशहाली : उत्पादन में कर्नाटक तीसरे स्थान पर
गन्ने की खेती और चीनी उत्पादन के मामले में उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद कर्नाटक तीसरे स्थान पर है। देश के चीनी उत्पादन में कर्नाटक की हिस्सेदारी १६ फीसदी है। लेकिन, राज्य के गन्ना उत्पादकों की हालत पड़ोसी राज्यों की तुलना में ज्यादा खराब है। सही तरीके से मूल्य तय नहीं होने से उन्हें लागत से कम कीमत मिल रही है। राज्य में उत्तर और दक्षिण क्षेत्र के किसानों के लिए गन्ने की अलग-अलग दरें तय होती हैं।

दक्षिण कर्नाटक में १६ मिलें हैं लेकिन यहां कटाई और परिवहन का खर्च उठाना पड़ता है, इसलिए उत्तर कर्नाटक की तुलना में प्रतिटन १०० रुपए ज्यादा मिलते हैं। उत्तर कर्नाटक की ४५ मिलें कटाई और परिवहन खर्च वहन करती हैं। किसान तमिलनाडु का मॉडल अपनाने की मांग कर रहे हैं जहां चीनी मिलें गन्ने की कटाई और परिवहन खर्च वहन करती हैं। हालांकि, कुमारस्वामी ने कहा कि वे चाहते हैं कि भविष्य में ऐसी समस्याएं न हो और इसलिए उन्होंने मुख्य सचिव को महाराष्ट्र और गुजरात में अपनाए जा रहे मॉडल पर रिपोर्ट देने के लिए
कहा है।

बेबस सरकार : आसान नहीं चीनी मिलों के खिलाफ कार्रवाई
कुमारस्वामी बढ़ते दबाव के बीच भले गन्ना किसानों के मसले पर सख्त दिख रहे हैं लेकिन बकाया का भुगतान नहीं करने वाले चीनी मिल मालिकों के खिलाफ कार्रवाई आसान नहीं होगी। निजी क्षेत्र की जिन चीनी मिलों पर किसानों का बकाया है उनमें से अधिकांश नेताओं से जुड़ी हैं। इनमें से कुछ में नेताओं अथवा उनके परिवार के नजदीकी लोग जुड़े हैं तो कुछ नेता सहकारी मिलों के संचालन से जुड़े हैं। ऐसे नेता राज्य के तीनों प्रमुख राजनीतिक दलों-कांग्रेस, भाजपा और जद-एस में हैं। यद्यपि जद-एस में चीनी मिलों से जुड़े नेताओं की संख्या कम है लेकिन कांग्रेस में ऐसे नेताओं की संख्या काफी है।


मंगलवार की बैठक में गठबंधन में साझीदार कांग्रेस के चीनी मिलों से जुड़े नेताओं की गैरहाजिरी भी इस बात का संकेत रही कि कुमारस्वामी के लिए किसानों को चीनी मिलों से बकाया का भुगतान दिलाना आसान नहीं होगा। हालांकि, गुरुवार को दुबारा हुई बैठक में बेलगावी और बागलकोट जिले के अधिकांश चीनी मिल मालिक नेता शामिल हुए लेकिन यह फलदायी नहीं रही। मिलें इस साल एफआरपी का भुगतान करने के लिए तैयार हैं लेकिन पिछले बकाया पर रुख अब भी साफ नहीं है। हालांकि, मुख्यमंत्री ने उन्हें एक पखवाड़े में भुगतान करने के लिए कहा है।


नेताओं से जुड़ी हैं अधिकतर मिलें
दरअसल, राज्य के ६५ चीनी मिलों में से ५८ ही चालू हैं। इनमें से सिर्फ दो चीनी मिलें ही सरकार के नियंत्रण में हैं। शेष ५६ में से २२ सहकारी और ३४ निजी क्षेत्र की हैं। निजी क्षेत्र की ३३ मिलें नेताओं और उनके परिजनों से जुड़ी हैं। उत्तर कर्नाटक के हर बड़े का जुड़ाव प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष तौर पर चीनी मिलों से है।

इसी कारण चीनी मिल लॉबी सरकार पर भारी पड़ती रही है। पिछली सिद्धरामय्या सरकार को भी इस लॉबी के कारण झुकना पड़ा था। सिद्धरामय्या सरकार ने चीनी मिलों के दबाव के कारण ही चीनी नियंत्रण कानून में समय पर भुगतान नहीं करने वाली मिलों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई के प्रावधान को हटा दिया था। किसान संगठन अब भी कानून में इस प्रावधान को जोडऩे की मांग कर रहे हैं।


चीनी मिलें सियासी शक्ति की पहचान
गन्ना उत्पादकों के आंदोलन का केंद्र बिंदु बने बेलगावी को राज्य का ‘चीनी का कटोरा’ कहा जाता है। करीब दो दर्जन चीनी मिलों वाले इस जिले का राज्य के चीनी उत्पादन ३५ फीसदी हिस्सेदारी है। जिले की २३ चीनी मिलों में से अधिकांश नेताओं की हैं और जिले के एक-तिहाई किसान जीवनयापन के लिए गन्ना उत्पादन पर निर्भर है। पड़ोसी बागलकोट जिले में भी १० चीनी मिलें हैं।

दोनों जिलों की राजनीति का शायद ही कोई ऐसा स्थापित चेहरा हो जिसका चीनी मिल से जुड़ाव न हो। कोई चीनी मिल का मालिक है तो कोई सहकारी चीनी मिल चलाता है। जिन नए उभरे नेताओं के पास चीनी मिलें नहीं हैं वे भी इससे जुडऩे की कोशिश मेें हैं। एक तरह से यह नेताओं के लिए राजनीतिक शक्ति की परोक्ष पहचान बन चुका है। पहली बार विधायक बने जिले के दो विधायकों के भी चीनी मिल स्थापित करने की चर्चा है।

खेती बढ़ी मगर उत्पादकता घटी
राज्य में गन्ने की खेती बढ़ी है लेकिन प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में गिरावट आई है। वर्ष २००९-१० में प्रति हेक्टेयर १०१ टन गन्ने का उत्पादन होता था लेकिन २०१६-१७ तक यह घट कर सिर्फ ७३ टन तक रह गया। २०१६ में प्रति हेक्टेयर उत्पादन ८० से ७५ टन तक आ गया था। हालांकि, इस साल अच्छी बारिश के कारण गन्ना उत्पादन बढऩे की उम्मीद है। गन्ना विकास आयुक्त सह चीनी निदेशक डॉ एम एन अजय भूषण कहते हैं कि इस साल फसल अच्छी रही है और समय पर बाजार में आ गई है। अधिकारियों का कहना है कि पिछले साल की तुलना में इस बार गन्ने का रकबा बढ़ा है और दक्षिण-पश्चिम मानसून में अच्छी बारिश होने के कारण उत्पादन भी अच्छा हुआ है।

आदेश और हकीकत में फर्क
पूर्व केंद्रीय मंत्री और किसान नेता बाबा गौड़ा पाटिल कहते हैं कि चीनी शायद ज्यादा राजनीतिकरण वाला उद्योग है। अधिकतर चीनी मिलें नेताओं के स्वामित्व वाली हैं। हर नेता ऐसी एक मिल का मालिक होना चाहता है। पाटिल कहते हैं कि नेताओं के चीनी उद्योग से जुड़े होने के कारण प्रशासन के लिए कानून और सरकारी आदेशों को लागू कराना संभव नहीं हो पाता। पाटिल कहते हैं कि चीनी नियंत्रण कानून के मुताबिक जिलाधिकारी को हर चीनी मिल के लिए आसपास के एक इलाके मेें गन्ना का रकबा तय करना होता है जहां उत्पादित गन्ना उस मिल को खरीदना होता है लेकिन हकीकत मेें यह कभी लागू नहीं हो पाता। नतीजतन किसानों को २००-३०० किमी दूर तक फसल ऐसी मिलों की तलाश मेें ले जानी पड़ती है जो फसल खरीदे।

ऐसे बढ़ी समस्या : ज्यादा उत्पादन और आयात से बाजार में चीनी की मांग घटी
मुख्यमंत्री कुमारस्वामी कहते हैं कि उन्होंने जिलाधिकारियों से चीनी मिलों की ओर से घोषित कीमत और किए गए भुगतान का ब्यौरा मांगा है। चीनी मिलों का कहना है कि ज्यादा उत्पादन और आयात के कारण बाजार मेें चीनी की मांग घट गई। ऐसे में उनके पास भंडार बचा है और किसानों को इतनी अधिक कीमत का भुगतान नहीं कर सकते। रिकवरी दर को लेकर भी विवाद है। मिलों को उम्मीद थी कि चीनी का भाव ४० रुपए किलो तक जाएगा लेकिन आयात और अधिक उपलब्धता के कारण भाव २९ रुपए प्रतिकिलो तक गिर गया।

हर दिन घटता है फसल का वजन
गन्ना एक नाजुक फसल है और कटाई के बाद इसका वजन हर दिन घटता है। गन्ना बिकने और पेराई में जितनी देरी होगी किसानों को वजन घटने पर उतना ही नुकसान होगा।


राज्य सरकार का सलाहकारी मूल्य (एसएपी) और केंद्र सरकार की ओर से तय निष्पक्ष और लाभकारी मूल्य (एफआरपी) भी पूरी तरह से लागू नहीं होता है। कई इलाकों में मिलें इससे कम राशि देती हैं। वे कहते हैं कि चीनी मिलें चीनी रुपांतरण और रिकवरी दर को लेकर भी कभी सही आंकड़े नहीं देतीं। एक अन्य किसान नेता ने कहा कि मिलें चीनी के अलावा गुड़ व अन्य उत्पादों से कमाई करती हैं लेकिन वे इसे किसानों से साझा नहीं करते।

शंकर शर्मा
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