दूसरों के हित चिंतन में स्वयं का भी हित निहित-आचार्य देवेंद्रसागर

धर्मसभा का आयोजन

By: Yogesh Sharma

Published: 23 May 2021, 03:11 PM IST

बेंगलूरु. जयनगर के धर्मनाथ जैन मंदिर में आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने कहा कि अधिकतर मनुष्य सुख कैसे मिले, इसी भावना से कर्म करते हैं। वह उस समय यह नहीं देखते कि मेरे इस कार्य से दूसरे को कोई दुख या हानि तो नहीं पहुंच रही है। इसी स्वार्थ पूर्ति के कारण वे पाप कर्म भी कर लेते हैं और कर्म बंधन में पड़ जाते हैं। दूसरी तरफ कर्मयोगी यह भाव रखकर कर्म करता है कि मेरे कर्म से दूसरों को सुख कैसे मिले। उसका उद्देश्य स्वार्थ रहित होकर अपना कर्तव्य पूरा करने का रहता है। जब हम सभी एक-दूसरे की हित की बात सोचकर निस्वार्थ भाव से अपना-अपना कर्म करते हैं, तब उसमें सभी का स्वाभाविक हित ही होता है और सभी का कल्याण होता है। विवेक से रहित पशु-पक्षी, वृक्ष, लताएं भी अपना-अपना कर्तव्य पालन करते हुए मनुष्यों का उपकार ही करते हैं, लेकिन विवेक प्रधान मनुष्य अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए दूसरों का अहित करता रहता है।
आचार्य ने कहा कि आज के समय में जब मानव जाति कोविड के कारण विकट समस्या का सामना कर रही है, ऐसे समय में भी हम दो प्रकार के स्वभाव वाले मनुष्यों को देख रहे हैं। कुछ निस्वार्थ भाव से अपनी सामथ्र्य और योग्यता के अनुसार एक-दूसरे की मदद करके मानव जाति की सेवा कर रहे हैं। दूसरी तरफ, कुछ मनुष्य ऐसे समय में भी अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए जरूरी पदार्थों की कालाबाजारी में लगकर केवल कुछ धन की प्राप्ति के लिए अनजाने में और अज्ञानता के कारण पाप कर्म में लगे हुए हैं। इसका परिणाम उन्हें स्वयं ही भुगतना पड़ेगा। इस प्रकार हम दैवी संपदा और आसुरी संपदा वाले दोनों प्रकार के मनुष्यों का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हैं। जब दूसरों का हित करने की भावना से कर्म होता है, तब हमारा हित तो स्वयं ही होता है। इसलिए हमें अपना प्रत्येक कर्म करने में बड़ा सावधान रहना चाहिए। हमें स्वयं ही विचार करना है कि हम जो कर्म कर रहे हैं, वह निष्काम भाव से हो रहा है, या उसके पीछे हमारा कोई स्वार्थ छिपा हुआ है। अपनी तरफ से किए जाने वाले सभी कर्मों का अच्छा, बुरा या मिला-जुला फल हमें स्वयं ही भुगतना पड़ेगा। इसके लिए किसी अन्य को दोष नहीं देना चाहिए।

Yogesh Sharma Reporting
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