प्रक्षेपण लागत घटाना अगली बड़ी चुनौती

चांद और मंगल पर पहुंच चुके भारत के लिए अब विकसित तकनीकों की लागत घटाना बड़ी चुनौती है।

By: शंकर शर्मा

Published: 15 Jan 2018, 10:26 PM IST

राजीव मिश्रा
बेंगलूरु. चांद और मंगल पर पहुंच चुके भारत के लिए अब विकसित तकनीकों की लागत घटाना बड़ी चुनौती है। सरकारी कामकाज में उपग्रह आधारित तकनीक का प्रयोग बढ़ा है लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। वैश्विक प्रक्षेपण बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए प्रक्षेपण लागत कम करने के साथ ही नई तकनीक और प्रणोदन प्रणाली का सतत विकास इसरो के लिए आसन्न भविष्य की बड़ी चुनौतियां होंगी।

ये बातें सोमवार को सेवानिवृत्त हो रहे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष ए एस किरण कुमार ने राजस्थान पत्रिका से विशेष बातचीत में कही। वे अपने अंतिम कार्य दिवस को भी आखिरी घंटे तक कार्यालय में डटे रहे और कई महत्वपूर्ण कार्यों को निपटाया। इन्हीं व्यस्तता के क्षणों में कुछ वक्त निकालकर उन्होंने राजस्थान पत्रिका से विशेष बातचीत की। पेश हैं बातचीत के कुछ खास अंश :


पिछले तीन साल के अपने कार्यकाल को कैसे देखते हैं?
वर्ष 201५ में जब मैंने कार्यभार संभाला तब इसरो की क्षमता बढ़ाने की जरूरत थी। उपग्रहों के जरिए संचार, नेविगेशन, भू-अवलोकन और अंतरिक्ष से अधिक से अधिक जानकारियां जुटाने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। पिछले तीन वर्षों के दौरान इस पर काफी काम हुआ। इसके अलावा भविष्य की तकनीकी जरूरतों को ध्यान में रखकर कई अनुसंधान कार्य भी हुए। री-यूजेबल लांच व्हीकल (स्पेस शटल) के विकास की दिशा में भी अहम प्रगति हुई। जब मैंने प्रभार संभाला उस समय पूर्व की समस्याएं अभी-अभी दूर हुई थीं। इसमें क्रायोजेनिक इंजन का नाम ले सकते हैं। मैं समझता हूं कि मेरा तीन साल का कार्यकाल संगठन के दृष्टिकोण से सुदृढ़ीकरण का दौर रहा। हमने देश और इसरो की जरूरतों के हिसाब से क्षमता निर्माण में काफी हद तक सफलता हासिल की। मांग और आपूर्ति के मद्देनजर अंतरिक्ष कार्यक्रमों में निजी क्षेत्रों की भागीदारी बढ़ाना आवश्यक है और इस दिशा में भी कुछ प्रगति हुई। इस दौरान हमने 18 मिशन लांच किए जबकि 3 बड़े उपग्रहों का प्रक्षेपण विदेशी धरती से हुआ।


इसरो अध्यक्ष पद से आप उस वक्त विदा हो रहे हैं जब संगठन के सामने कई चुनौतियां हैं। कई महत्वपूर्ण मिशनों पर काम चल रहा है। एक साल में 12 प्रक्षेपण पूरा करने का लक्ष्य है? क्या उम्मीदें हैं?

इसरो के लिए यह अच्छी बात है कि जो भी संगठन का नेतृत्व संभालता है वह उसे और आगे ले जाता है। यह परंपरा चली आ रही है और आगे भी चलती रहेगी। आगे जो अध्यक्ष आएंगे वो इसरो को और ऊंचाई पर ले जाएंगे।


आपने सरकारी कामकाज में अंतरिक्ष तकनीक के अधिकतम प्रयोग पर बल दिया। सरकार को कितना समझा पाए और आज की स्थिति से कितने संतुष्ट हैं?


सरकारी कामकाज में अंतरिक्ष तकनीक के उपयोग की हमेशा गुंजाइश बनी रहती है। काफी चीजों में इसका इस्तेमाल हो सकता है। मगर इसे उपयोगी बनाने के लिए काफी काम भी करना पड़ता है। मैं कह सकता हूं कि पहले की अपेक्षा केंद्र और राज्य सरकारों के विभागों में अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल काफी बढ़ा है। पिछले हफ्ते ही नाविक प्रणाली का प्रयोगिक परीक्षण मछुआरों के सहयोग से किया गया।

समुद्र में जाने वाले मछुआरों की पोजिशनिंग पता करने, उनसे संचार स्थापित करने तथा वे जहां जा रहे हैं वहां से संभावित फिशिंग जोन कहां हैं, इसका पता लगाने का परीक्षण कामयाब रहा है। परीक्षण के दौरान मछुआरे 100 से 180 नॉटिकल मील दूर तक गए। यहां तक की मौसम में बदलाव और हवाओं की गति आदि के बारे में उन तक सटीक जानकारी पहुंचाई गई। मछुआरों ने इसे काफी सहायक बताया। इस तरह की सेवाएं काफी मददगार साबित होती हैं। केंद्र एवं राज्य सरकारों की दिलचस्पी अंतरिक्ष तकनीक के उपयोग के प्रति बढ़ी है। जैसे -जैसे राज्य सरकार के विभागों में अंतरिक्ष तकनीक का उपयोग बढ़ेगा उसकी मांग भी बढ़ेगी।


संचार, नेविगेशन और रिमोट सेंसिंग पे-लोड आपका पसंदीदा विषय रहा है। इस क्षेत्र में क्या प्रगति हुई?
पिछले दिनों इन तीनों क्षेत्रों में काफी प्रगति हुई है। संचार, नेविगेशन और रिमोट सेंसिंग उपग्रहों की संख्या बढ़ी है। फिलहाल हमारे पास 4५ सक्रिय उपग्रह हैं। उपग्रहों की संख्या बढऩे से हम देश को विभिन्न क्षेत्रों में सटीक सेवाएं दे रहे हैं। सभी क्षेत्रों में तरक्की हुई है।


कोई ऐसा मिशन या कार्य जो आप अपने कार्यकाल में पूरा करना चाहते थे और नहीं हो पाया?
नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। अंतरिक्ष कार्यक्रमों की जटिलता को देखते हुए कुछ न कुछ चलता ही रहता है। लेकिन, जिस गति से कार्य करने की आवश्यकता थी और क्षमता निर्माण के लिए जो किया जाना चाहिए था उसमें हम काफी हद तक सफल हुए हैं।


इसरो और देश के लिए आपका संदेश?
इसरो का मुख्य उद्देश्य बाह्य आकाश के जरिए आम आदमी की समस्याएं हल करना है। इसे हमेशा याद रखें और इन्हीं उद्देश्यों को लेकर आगे बढ़ें।


तो अगले तीन साल के दौरान इसरो को कहां देखना चाहते हैं?
अगले तीन साल में देखना चाहूंगा कि संचार, नेविगेशन और भू-अवलोकन के क्षेत्र में देश को अंतरिक्ष से जो सहूलियतें मिलनी चाहिए उसे हासिल कर पाएं। अभी प्रक्षेपण संख्या बढ़ाने की जरूरत है। जो आवश्यकताएं हैं उसे हम उसे पूरा नहीं कर पाए हैं। जितने सक्रिय उपग्रह चाहिए अभी नहीं हो पाए हैं। हालांकि, हमने इसे काफी बढ़ाया है। गति बढ़ रही है। काफी मिशनों को लांच करने के लिए क्रमबद्ध भी कर दिया है। अगर इस पर अमल हो पाया तो देश की जितनी जरूरतें हैं उसके करीब पहुंच जाएंगे।

शंकर शर्मा
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