अप्रमादी व्यक्ति तिनके से भी सुरक्षा प्राप्त कर लेता है

अप्रमादी व्यक्ति तिनके से भी सुरक्षा प्राप्त कर लेता है
अप्रमादी व्यक्ति तिनके से भी सुरक्षा प्राप्त कर लेता है

Yogesh Sharma | Publish: Oct, 09 2019 08:09:56 PM (IST) Bangalore, Bangalore, Karnataka, India

धर्मसभा में बोले उपाध्याय प्रवीण ऋषि

बेंगलूरु. गणेश बाग में 21 दिवसीय श्रीमद् उत्तराध्ययन श्रुतदेव की आराधना में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने कहा कि प्रमादी व्यक्ति को धन भी सुरक्षा प्रदान नहंी करता है और अप्रमादी व्यक्ति तिनके से भी सुरक्षा प्राप्त कर लेता है। उसी प्रकार बुढ़ापा आने के बाद शरण नहीं मिल सकती है तथा बुढ़ापे से बचाने वाला कोई नहीं है इसको जो जान लेता है वो हिंसा में आसक्त नहीं हो पाता है। जो ये सोचकर कि मैं कभी नहीं मरूंगा पाप कर्मों से धन का अर्जन करते हैं, लेकिन एक समय ऐसा आता है उस व्यक्ति की हालत बेडिय़ों में जकड़े हुए कैदी जैसी हो जाती है। जैसे बेडिय़ों से जकड़ा हुआ आदमी जिधर पुलिस ले जाती है उधर चला जाता है वैसे ही धन कमाने के लिए जो दुश्मनी मोल ली है वो नरक में ले जाती है।
लोगों को लगता है कि धन सुरक्षा देता है लेकिन धन उनको ही सुरक्षित करता है जो भामाशाह बन जाए। यदि प्रमादी के व्यक्ति के हाथ में धन चला जाता है तो और नरक की यात्रा शुरू हो जाती है। अप्रमादी के हाथ में चला जाए तो शायद सुरक्षा हो सकती है जैसे दिया बुझने के बाद देखा हुआ भी अनदेखा हो जाता है। प्रमादवश ही दिया बुझ जाता है और जाना अनजाना जैसा हो जाता है। ये प्रमाद ही है जो दिए को बुझा देता है जो अप्रमादी के लिए कभी दिया नहीं बुझता है। अप्रमादी व्यक्ति के लिए परमात्मा ने कहा कि जैसे सोए हुए लोगों के बीच में जागा हुआ व्यक्ति रहता है उसी तरह इस दुनिया में जीना चाहिए। सोने वाले को देखकर नींद जल्दी आ जाती है और उन पलों में जो जाग जाता है। वहीं सफलता का मार्ग तय करता है। जागने का छोटा सा सूत्र दिया है देव गुरु धर्म पर हमेशा भरोसा करना चाहिए। इन तीनो के अलावा किसी पर विश्वास नहीं होना चाहिए।
मनुष्य का जीवन संयुक्त उपक्रम है जहां अन्दर से भी सहयोग मिलता है और बाहर से भी। यदि कोई चोर बन जाए तो दोनों तरफ से फंस जाता है और साहूकार बन जाए तो दोनो तरफ से सहयोग मिलता है। यदि चोर बनकर जीए तो अंदर से भी विरोध होता है और बाहर भी। जब जीवन में चोर बनकर जीते है तो अंदर और बाहर में दोनो ओर ऐसा ही द्वंद्व चलता है। परमात्मा ने चोर की छोटी सी परिभाषा दी है जो संयम और धर्म आराधना में अपनी शक्ति को छिपाता है। जो अपने बल का गोपन करता है जितना कर सकता है उतना नहीं कर पाता है ऐसा व्यक्ति नरक में चला जाता है। जहां उसको कोई बचाने वाला नहीं मिलता है। इसलिए परमात्मा फरमाते हंै। हम संसार में रहकर आपत्ति में फंसे हुए जब छोटे छोटे कार्य करते जिनका कोई प्रयोजन नहीं रहता है क्योंकि हम सभी परिवार संघ समाज और देश के प्रमादवश कार्य करते हैं उस समय जो प्रमाद के कारण से बंध होता है और उस प्रमादवश जो कर्म उदय में आयेगा उस समय कोई बंधु उसमें सहभागी नहीं होता है। ये कर्मसत्ता का ऐसा कड़वा सच जिसको कितना भी इंकार करो लेकिन स्वीकार करना ही पड़ेगा कोई बंधु आकर बचाना चाहे तो बचा नहीं पाएगा।

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