खंडहर होने लगा गंगूबाई हानगल का आवास

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का स्तम्भ रहीं गायन कोकिला डॉ. गंगूबाई हानगल का धारवाड़ के शुक्रवार पेट में स्थित आवास खंडहर होने लगा है।

By: शंकर शर्मा

Published: 24 Jul 2018, 10:42 PM IST

हुब्बल्ली. हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का स्तम्भ रहीं गायन कोकिला डॉ. गंगूबाई हानगल का धारवाड़ के शुक्रवार पेट में स्थित आवास खंडहर होने लगा है। एक दशक पूर्व राज्य सरकार ने गंगूबाई के इस आवास को खरीद कर लाखों रुपए की लागत से इसे गंगोत्री म्यूजियम के रूप में परिवर्तित करवाया लेकिन अब उपेक्षा का आलम यह है कि गंगूबाई के योगदान को दर्शाने वाला यह म्यूजियम खंडहर होता जा रहा है। यह घर सांप, नेवला, बंदर व आवारा श्वानों का आश्रयस्थल बन गया है।


जहां से किराना घराना संगीत स्वर सुनाई देने चाहिए थे आज उस घर में भीतरी दुख के स्वर सुनाई दे रहे हैं। पूरे देश में शास्त्रीय संगीत को बढावा देने वाले धारवाड़ की गायन कोकिला गंगूबाई के आवास की दुर्दशा संगीतप्रेमियों में विषाद का कारण बन रही है।


गायनकोकिला के नाम से संगीत जगत में मशहूर हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत में धारवाड़ के नाम को देश भर में लोकप्रिय करने वाली डॉ. गंगूबाई हानगल का जिस घर में जन्म हुआ और उनकी परवरिश हुई वह घर (गंगोत्री म्यूजियम) आज खंडहर बन गया है। इस घर में सांपों, नेवलों, बंदरों, आवारा श्वानों आदि ने डेरा जमा लिया है।


धारवाड़ के शुक्रवार पेट स्थित इस घर में ही डॉ. गंगूबाई हानगल ने संगीत की पढ़ाई आरम्भ की थी। इसी घर के खंभों के साए में बैठकर संगीत का अभ्यास करने के दौरान संगीत रत्न अब्दुल करीम खान से प्रशंसा प्राप्त की थी। इसके चलते राज्य सरकार ने लाखों रुपए खर्च कर इस घर को गंगोत्री म्यूजियम में परिवर्तित करवाया परन्तु रखरखाव की कमी के कारण खंडहर बना गंगोत्री म्यूजियम आसपास के लोगों के लिए दु:स्वप्न बन कर रह गया है। आजादी से पहले ही गंगूबाई हानगल ने धारवाड़ के घर को छोडक़र हुब्बल्ली में आ बसी थीं। तब धारवाड़ का घर कृष्णाजी कित्तूर नामक व्यक्ति को बेचा था। बाद में यह देसाई कुलकर्णी के स्वामित्व में चला गया।

वर्ष 2007 में राज्य सरकार ने दस लाख रुपए में यह घर खरीदा और 12.75 लाख रुपए की लागत से इसका नवीनीकरण किया। संगीत के साजोसामान, फोटो रखकर इसे म्यूजियम में परिवर्तित किया। वर्ष 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बी.एस. येड्डियूरप्पा ने इसका लोकार्पण किया था। अब यह गंगोत्री म्यूजियम के तौर पर नहीं रहकर भूत बंगले की तरह खस्ताहाल हो गया है। घर की छत गिर चुकी है। गेट चोर चुरा ले गए। दीवारों पर पेड़ उग कर पूरे घर को जर्जर कर रहे हैं। छत गिरने से बंदरों ने गंगूबाई के इस घर को अपना ठिकाना बना लिया है।


दुर्दशा का जिम्मेदार कौन?
गंगूबाई हानगल ने परिजनों का कहना है कि सरकार तथा हानगल परिवार के बीच संघर्ष के कारण गंगोत्री खंडहर बना है। वर्ष 2008 में मनोज हानगल ने म्यूजियम को सरकार को हस्तांतरित किया। इसके बाद दो वर्ष तक सब कुछ ठीकठाक रहा। वर्ष 2010 में स्थापित हुब्बल्ली के गंगूबाई हानगल गुरुकुल ट्रस्ट में हानगल परिवार को पद नहीं देने का असर गंगोत्री म्यूजियम के रखरखाव पर भी पड़ा। ट्रस्ट के स्वामित्व के घर का रखरखाव नहीं चाहिए कह कर कन्नड़ एवं संस्कृति विभाग को सौंपा है परन्तु विभाग का कहना है कि किसी प्रकार की चाबी या जिम्मेदारी उसे हस्तांतरित नहीं हुई। इन दोनों के बीच झूलने से गंगोत्री म्यूजियम अनाथ हो गया है।


लोग भयभीत रहते हैं
स्थानीय निवासियों का कहना है कि डॉ. गंगूबाई हानगल के घर में रात्रि होते ही विषैले जीवजंतु घुस जाते हैं जिससे लोग भयभीत रहते हैं। ***** और श्वानों के लडऩे के नजारे आम हैं। इसके चलते स्थानीय निवासियों ने घर की खिड़कियों को कील ठोककर बंद कर दिया है। इसके अलावा घर के सामने लगी कीमती लकडिय़ां व पत्थर चोर चुरा ले गए हैं।

संस्कृति विभाग को नहीं शर्म
गंगूबाई हानगल के घर गंगोत्री म्यूजियम में सांप, बिच्छू बसे हैं। रात होते ही वे बाहर आ जाते हैं। इससे यहां रहने वालों में डर बना रहता है। खिडक़ी, दरवाजों को बंद करने पर भी सांपों की समस्या से छुटकारा नहीं मिला है। संगीत के क्षेत्र में धारवाड़ को पूरे देश में प्रख्यात कराने वाली गंगूबाई हानगल के घर का यह हाल देखने के बाद भी हाथ पर हाथ धरे बैठे कन्नड़ एवं संस्कृति विभाग को शर्म महसूस नहीं होती। सरकार को इस घर के नवीनीकरण के लिए प्राथमिकता देनी चाहिए। उदय यंडिगेरी, स्थानीय निवासी

सरकार को अवगत कराया है
म्यूजियम बनाकर इसके रखरखाव की जिम्मेदारी कुछ शर्तों के साथ गंगूबाई हानगल परिवार को सौंपी गई थी। अभी इसके रखरखाव की जिम्मेदारी उन्हीं पर है। इसके बावजूद गंगोत्री म्यूजियम की खस्ता हालत को देखते हुए विशेष अनुदान मंजूर करवाने की मांग को लेकर राज्य सरकार को पत्र लिखा गया है।
सिध्दलिंगेश रंगण्णवर, उपनिदेशक, कन्नड़ एवं संस्कृति विभाग, धारवाड़

शंकर शर्मा
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