साहित्य में सदैव भारतीयता का स्वर

साहित्य कभी क्षेत्रीय अभिव्यक्ति नहीं होता बल्कि वह हमेशा भारतीयता का स्वर लिए होता है। ये विचार बेंगलूरु विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ प्रभाशंकर प्रेमी ने जैन डीम्ड विश्वविद्यालय, जयनगर के हिंदी विभाग के तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी हिंदी साहित्य में आनंद की परिकल्पना को संबोधित करते हुए व्यक्त किया।

By: Santosh kumar Pandey

Published: 01 Mar 2020, 07:19 PM IST

बेंगलूरु. साहित्य कभी क्षेत्रीय अभिव्यक्ति नहीं होता बल्कि वह हमेशा भारतीयता का स्वर लिए होता है। ये विचार बेंगलूरु विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ प्रभाशंकर प्रेमी ने जैन डीम्ड विश्वविद्यालय, जयनगर के हिंदी विभाग के तत्वावधान में आयोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी हिंदी साहित्य में आनंद की परिकल्पना को संबोधित करते हुए व्यक्त किया।

संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे पटना से आए साहित्यकार डॉ नृपेन्द्रनाथ गुप्त ने अपने उद्बोधन में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के अंत: संबंधों की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने अंग्रेजी के बढ़ते वर्चस्व पर चिंता जताई। भागलपुर विश्वविद्यालय के सेवानिवृत हिंदी प्राध्यापक डॉ सत्येन्द्र अरुण भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में भाषा भारती संवाद वर्ष २०२० के तीसरे अंक का लोकार्पण किया गया।

डॉ अरविंद कुमार, डॉ मैथिली पी राव, डॉ श्रीनिवासय्या आदि ने संगोष्ठी के आयोजन में महत्ती भूमिका निभाई। इस अवसर पर कौशल कुमार पटेल, स्वपना चतुर्वेदी, तुलसी छेत्री, रजनी शाह, मीनाक्षी एवं राखी शाह ने अपने प्रपत्र प्रस्तुत किए। संचालन डॉ भंवर सिंह एवं डॉ प्रकाश कांबले ने किया।

Santosh kumar Pandey Desk
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