scriptUnseasonal rain brought disaster for coffee growers | कॉफी उत्पादकों के लिए आफत लेकर आई बेमौसम बारिश | Patrika News

कॉफी उत्पादकों के लिए आफत लेकर आई बेमौसम बारिश

- कर्नाटक : सरकार से हस्तक्षेप की मांग

बैंगलोर

Updated: November 18, 2021 11:52:55 pm

बेंगलूरु. पिछले कुछ दिनों से जारी भारी बेमौसम बारिश ने प्रदेश के कॉफी उत्पादकों की चिंता बढ़ा दी है। कॉफी उत्पादक फसलों को प्रभावित करने वाले ब्लैक रोट रोग की आशंका से जूझ रहे हैं।

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कोडुगू, कूर्ग, चिकबल्लापुर, सकलेशपुर व हासन जिला प्रमुख कॉफी उत्पादक क्षेत्र हंै। बारिश के कारण कॉफी की कटाई नहीं हो पा रही है। किसान धान और सुपारी की फसलों के साथ काटी हुई कॉफी की फलियों को सुखाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
बेमौसम बारिश के कारण कॉफी बेरीज भी पौधों से गिर गई हैं। अरेबिका कॉफी बेरी जो फसल के लिए तैयार हैं, पेड़ों से गिर रही हैं। बारिश से कई धान के खेत भी जलमग्न हो गए हैं।

सुपारी किसानों को भी इन्हीं परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। पेड़ से उपज गिर रही है। पिछले तीन वर्षों से कॉफी में ब्लैक रॉट रोग की समस्या का सामना कर रहे है, जिसका असर उपज पर पड़ा है।

कोडुगू में भी बारिश किसानों के लिए मुसीबत लेकर आई है। यह कॉफी की कटाई और उसे सुखाने का मौसम है। लेकिन पिछले एक सप्ताह से बारिश के कारण बेरी गिरना शुरू हो गई है। इसे सुखाना मुश्किल हो गया है। दिसंबर तक रोबस्टा कॉफी की कटाई शुरू होनी है।

बारिश में बह गए धान के खेतों के अलावा कॉफी के बागानों में पैदा होने वाली काली मिर्च और इलायची जैसे मसाले भी नष्ट हो गए हैं।

कोडुगू के विराजपेट में कॉफी उगाने वाले चेंगप्पा ने कहा कि उनके जैसे छोटे बागान मालिकों को विशेष रूप से बारिश के कारण समस्या का सामना करना पड़ रहा है। बड़े बागान मालिकों ने अपने बागानों में ड्रायर मशीनें लगाई हैं, जो उनकी उपज की रक्षा कर सकती हैं।

छोटे किसान जलाऊ लकड़ी का उपयोग करके जामुन को सुखाने के लिए वैकल्पिक तरीकों की तलाश कर रहे हैं। इसका आय पर बहुत बड़ा प्रभाव पडऩे वाला है। आमतौर पर पके हुए बेर को धूप में सुखाया जाता है। लेकिन परिस्थितियों ने कई लोगों को जलाऊ लकड़ी के चूल्हे का उपयोग करने के लिए मजबूर किया है।

राज्य में कॉफी बागान मालिकों ने चार साल के अंतराल के बाद इस बार बेहतर फसल की उम्मीद की थी। इस साल नवंबर में हुई बेमौसम बारिश ने खड़ी फसलों को नुकसान पहुंचाया है।

कॉफी उत्पादकों के संघ का कहना है कि बाजार में 50 किलो कॉफी बीन्स की कीमत अब लगभग 1995 की कीमत के बराबर है।

कोडुगू ग्रोअर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष हरीश अप्पैया ने बताया कि 1995 में 50 किलो रोबस्टा चेरी कॉफी बैग की कीमत 3,500 रुपए थी। अब 2021 में भी यही कीमत जारी है जबकि लेबर चार्ज और उर्वरकों की लागत बढ़ गई है।

इस बीच, कर्नाटक प्लांटर्स एसोसिएशन ने केंद्र से कॉफी उत्पादकों द्वारा लिए गए ऋण की अवधि बढ़ाने का आग्रह किया है। एसोसिएशन के अध्यक्ष एस. अप्पादुरई ने यह कहते हुए राहत मांगी कि यह क्षेत्र संकट के दौर से गुजर रहा है। एसोसिएशन का सुझाव है कि इन पुनर्निर्धारित ऋणों पर 10 प्रतिशत की वार्षिक ब्याज दर हो सकती है। लेकिन ब्याज का बोझ केंद्र, बैंकों और बैंकों द्वारा समान रूप से साझा किया जाना चाहिए। बारिश के दौरान कटाई बहुत चुनौतीपूर्ण है और सुखाने वाले यार्ड में फलियां फैलाना मुश्किल हो गया है। पिछले कॉफी सीजन में भी कोरोना महामारी के कारण श्रमिकों की कमी के कारण पूरी फसल की कटाई नहीं हो पाई थी।

कर्नाटक में भारत के कॉफी उत्पादन का 70 प्रतिशत हिस्सा है। कॉफी फसलों को हुए नुकसान का सही आकलन सरकार द्वारा किया जाना बाकी है।

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