उपाध्याय ने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया

श्रीरंगपट्टण में प्रवचन

By: Santosh kumar Pandey

Published: 20 Jul 2020, 10:00 PM IST

बेंगलूरु. श्रीरंगपट्टण के दिवाकर गुरु मिश्री दरबार में उपाध्याय केवलमुनि की जयंती पर साध्वी मंडल ने कहा कि उपाध्याय केवलमुनि आज के युग में एक ऐसे सच्चे आदर्शवादी संत रत्न थे। जिन्होंने जीवन के प्रत्येक क्षण को पूर्ण सजगता के साथ एवं साहसपूर्वक जीया। अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया।

जीवन की अंतिम सांस तक उन्होंने वही किया जो उन्हें मान्य था, प्रिय था और जिसके लिए उनका जीवन समर्पित था। आज कोई भक्त उन्हें करूणा का मसीहा कहता है तो कोई उन्हें राम का रूप मानता है। कोई दया मूर्ति धर्मरुचि की उपमा देता है तो कोई सरस्वती का वरदपुत्र बताता है।

आशापूर्ण जीवन
वे निराशापूर्ण जीवन में आशा, उत्साह और आनंद की बहारें लाने में समर्थ थे। उनकी वाणी मधुर थी, उसके पीछे उनके जीवन का गहरा अनुभव और आशापूर्ण जीवन दृष्टि छिपी हुई थी।

साहित्य- प्रेमी और कर्मठ संत
70 वर्ष के साधु जीवन में उन्होंने कश्मीर से कन्याकुमारी तक सम्पूर्ण भारत की पद यात्राएं कीं। उन्होंने साहित्य की विभिन्न विधाओं यथा-कथा, उपन्यास, नाटक, ललित निबंध, आगम, काव्य आदि पर लगभग 100 पुस्तकें लिखी।

शिक्षा के हिमायती
वे नारी शिक्षा के हिमायती थे। उनकी प्रेरणा से चेन्नई के जैन समाज ने कन्या महाविद्यालय की स्थापना की तथा बेंगलूरु में भगवान महावीर एजुकेशन ट्रस्ट बनाया। इसलिए दक्षिण भारत में एक ज्ञान का दीप निरन्तर जल रहा है। 20 मई 1994 को बेंगलूरु में उन्होंने भौतिक देह त्यागकर महाप्रयाण किया।

बेंगलूरु में अनगिनत परिवारों पर गुरु केवल की कृपा दृष्टि है। गुरु केवल के आशीर्वाद से जैन यूनिवर्सिटी विद्यमान है। गुरु भक्त वर्षावास समिति मैसूरु गुरु केवल के चरणों में श्रद्धा भक्ति से वंदन नमन करता है। साध्वी मंडल भी गुरु केवल के उपकारों को कभी विस्मिृत नहीं कर सकतीं।

Santosh kumar Pandey Desk
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