टीबी बैक्टीरिया के खिलाफ वायरस बनेंगे अचूक हथियार

आइआइएससी के वैज्ञानिकों ने तैयार किया पांच वायरस का कॉकटेल
एंटीबायोटिक रोधी बैक्टीरिया भी नहीं बच पाएंगे

By: Rajeev Mishra

Published: 24 Dec 2020, 07:49 PM IST

बेंगलूरु.
वायरस...! नाम सुनते ही संक्रमण का खतरा और उससे जुड़ी तकलीफें सिहरा देती हैं। लेकिन, दर्द ही अगर दवा बन जाए तो...!
भारतीय विज्ञान संस्थान (आइआइएससी) के वैज्ञानिकों ने जानलेवा बीमारी टीबी के जनक जीवाणु 'माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिसÓ के खात्मे के लिए वायरस (विषाणु) को एक हथियार के रूप में आजमाया है।

आइआइएससी में सेंटर फॉर बायोसिस्टम्स साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर रचित अग्रवाल ने 'पत्रिका' को बताया कि जिस तरह आम आदमी को वायरस संक्रमित करता है वैसे ही कुछ वायरस बैक्टीरिया पर हमला करते हैं। उन्हें बैक्टीरियोफेज (जीवाणुभोजी या जीवाणुभक्षी) कहते हैं। लेकिन, ये बैक्टीरियोफेज विशिष्ट प्रकार के होते हैं और किसी एक ही तरह के बैक्टीरिया पर हमला कर उन्हें खत्म करते हैं। जब ये बैक्टीरिया एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं तो ऐसे जिद्दी बैक्टीरिया को मारना मुश्किल हो जाता है। उनकी टीम ने अपने प्रयोग के दौरान टीबी के जनक बैक्टीरिया 'माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस' पर प्रयोग कर देखा कि क्या बैक्टीरियोफेज अलग-अलग परिस्थितियों में उन्हें मार सकता है।

हर हाल में मारे जाएंगे
उन्होंने बताया कि जब रोग (टीबी) होता है तो बैक्टीरिया अलग-अलग वातावरण में रहते हैं। कई बार वे जिस वातावरण में रहते हैं वहां पीएच वैल्यू कम (अम्लीय वातावरण) और कई बार ज्यादा (क्षारीय वातावरण) होता है। कई बार वहां ऑक्सीजन की मात्रा कम होती है तो कई बार सुसुप्त अवस्था में बैक्टीरिया मौजूद रहता है और हमला करने के लिए अनुकूल परिस्थितियों का इंतजार करता है। प्रयोग के दौरान पाया कि बैक्टीरियोफेज इन सभी परिस्थितियों में 'माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिसÓ को पूरी तरह खत्म करने में सक्षम है।

एंटीबायोटिक के साथ अधिक कारगर
इसके बाद वैज्ञानिकों ने यह भी देखा कि अगर एंटीबायोटिक के साथ बैक्टीरियोफेज दिया जाए तो क्या यह और बेहतर काम करेगा। रचित अग्रवाल ने बताया कि अगर दोनों एक साथ दें तो बैक्टीरिया और जल्दी मारा जाता है। किसी एक वायरस के प्रति ये बैक्टीरिया प्रतिरोधी ना बन जाएं इसलिए पांच तरह के बैक्टीरियोफेज का एक कॉकटेल तैयार किया है। यानी, टीबी के जनक बैक्टीरिया के खात्मे के लिए एक अचूक हथियार।

हर वर्ष लाखों होते हैं टीबी का शिकार
प्रोफेसर अग्रवाल ने बताया कि प्रयोग अभी शुरुआती चरण में है। इसका व्यवहारिक इस्तेमाल हम कुछ वर्षों में देख पाएंगे। गौरतलब है कि टीबी दुनिया की दस शीर्ष बीमारियों में से है जिससे सबसे अधिक मौतें होती हैं। हर वर्ष दुनिया ेमें लगभग एक करोड़ लोग इसका शिकार होते हैं जिनमें से 14 लाख लोगों की मौत हो जाती है। भारत इसका सबसे अधिक शिकार है। वर्ष 2018 में देश में 4.5 लाख लोग इस बीमारी से मारे गए।

Rajeev Mishra Reporting
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