युवा जोश की राजनीति को कितना ठोस बनाएंगे मतदाता

चुनाव में राजनीतिक दल युवा जोश की जगह अनुभव को तरजीह देते हैं और इस बार के लोकसभा चुनाव के लिए घोषित उम्मीदवारों को देखें तो यही बात सामने आता है।

By: शंकर शर्मा

Published: 29 Mar 2019, 02:18 AM IST

प्रियदर्शन शर्मा

बेंगलूरु. चुनाव में राजनीतिक दल युवा जोश की जगह अनुभव को तरजीह देते हैं और इस बार के लोकसभा चुनाव के लिए घोषित उम्मीदवारों को देखें तो यही बात सामने आता है। हालांकि कई लोकसभा चुनावों के बाद यह पहला मौका है जब राज्य के चुनावी समर में 40 वर्ष से कम आयु के कई उम्मीदवार मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में मैदान में है।

भाजपा ने बेंगलूरु दक्षिण से 28 वर्षीय तेजस्वी सूर्य को उम्मीदवार बनाया है जबकि मैसूरु से प्रताप सिम्हा उम्मीदवार हैं, जो 2014 के लोकसभा चुनाव में कर्नाटक से एक मात्र 40 वर्ष से कम आयु के सांसद थे। वहीं, जनता दल-एस ने पार्टी सुप्रीमो एचडी देवेगौड़ा को तुमकूरु से उम्मीदवार बनाया है जो राज्य में सबसे उम्रदराज उम्मीदवार हैं, लेकिन देवेगौड़ा के दो पोते निखिल गौड़ा और प्रज्वल रेवण्णा क्रमश: मंड्या और हासन से उम्मीदवार हैं और दोनों करीब 30 वर्ष के हैं।

इसी प्रकार कांग्रेस ने दक्षिण कन्नड़ से 34 वर्षीय मिथुन रई और बेंगलूरु मध्य से 39 वर्षीय रिजवान अरशद को उम्मीदवार बनाया है। बागलकोट से कांग्रेस उम्मीदवार वीणा कशप्पानवर भी कुछ महीने पूर्व ही 40 की हुई हैं। देखा जाए तो इस बार के चुनाव में प्रमुख दलों ने 2014 के मुकाबले टिकट बंटवारे में ज्यादा युवा चेहरों को प्रमुखता दी है।

हालांकि जिन युवाओं को टिकट मिला है, उनमें ज्यादातर राजनीतिक परिवारों से संबंध रखते हैं। निखिल और प्रज्वल जहां देवगौड़ा परिवार की राजनीतिक विरासत की तीसरी पीढ़ी हैं, वहीं भाजपा के तेजस्वी के चाचा रवि सुब्रमण्या भी विधायक हैं। वहीं कांग्रेस की वीणा के पति विजयानंद कशप्पानवर पहले विधायक रह चुके हैं। मिथुन रई, प्रताप सिम्हा जैसे कुछ नाम जरूर हैं जो पूरी तरह से गैर राजनीतिक परिवार से आते हैं।

इस बार भी युवा चेहरों के सामने अनुभवी प्रतिद्वंद्वी हैं। प्रज्वल को ए. मंजू तो तेजस्वी को बीके हरिप्रसाद, मिथुन को नलिन कुमार कटील, रिजवान को पीसी मोहन जैसे धाकड़ राजनीतिक महारथियों से लोहा लेना है। हालांकि निखिल के सामने सुमालता की चुनौती है, जो कन्नड़ फिल्म स्टार रही हैं। इसलिए अब मतदाताओं पर निगाह है कि वे युवा जोश की राजनीतिक को कितना ठोस करते हैं।

मतदाताओं को भाते हैं अनुभवी प्रत्याशी
लोकसभा चुनाव २०१४ के दौरान मात्र प्रताप सिम्हा ही ऐसे सांसद थे जो ४० वर्ष से कम थे, जबकि पिछले चुनाव में भी कई निर्दलीय और रानजीतिक दलों से रिजवान अरशद जैसे कुछ उम्मीदवार किस्मत आजमा रहे थे। २०१४ में १३३ ऐसे उम्मीदवार थे, जिनकी उम्र ४० वर्ष से कम थी, इसमें भाजपा ने ३ और कांग्रेस ने ४ उम्मीदवार इस आयु वर्ग में बनाया था। लेकिन, जीत सिर्फ भाजपा के प्रताप सिम्हा को मिली। २००९ में भी ४० आयु वर्ग में १३७ उम्मीदवार थे जिसमें भाजपा के ३, कांग्रेस के २ और जद-एस के १ उम्मीदवार थे, लेकिन जीत सिर्फ भाजपा के ३ उम्मीदवारों को मिली। यानी युवाओं की राजनीति मतदाताओं को रास नहीं आती है बल्कि वे अनुभव पर मुहर लगाते हैं।

शंकर शर्मा
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