टिकट की बात होती है तो महिलाओं की याद नहीं आती

लोकसभा चुनाव के लिए घोषित उम्मीदवारों की सूची ने एक बार फिर साबित किया हैकि राज्य में किसी भी राजनीतिक दल ने महिलाओं को ३३ प्रतिशत तो क्या ३ प्रतिशत सीटों पर भी उम्मीदवार नहीं बनाया है।

By: Santosh kumar Pandey

Published: 29 Mar 2019, 08:21 PM IST

टिकट बंटवारे में हर राजनीतिक दल ने महिलाओं को नकारा
बेंगलूरु. लोकसभा चुनाव के लिए घोषित उम्मीदवारों की सूची ने एक बार फिर साबित किया है कि राज्य में किसी भी राजनीतिक दल ने महिलाओं को ३३ प्रतिशत तो क्या ३ प्रतिशत सीटों पर भी उम्मीदवार नहीं बनाया है। महिलाओं को राजनीति में पुरुषों की भांति समान प्रतिनिधित्व देने की बात हर दल और उसके नेता करते हैं, लेकिन टिकट देने के दौरान हर बार महिलाओं को पत्ता साफ हो जाता है।

राज्य की लोकसभा २८ सीटों पर इस बार भाजपा और कांग्रेस तथा जनता दल-एस गठबंधन की ओर से सिर्फ ३ महिलाओं को उम्मीदवार बनाया गया है। संयोग से तीनों ही दलों ने एक-एक महिला को टिकट दिया है। उम्मीदवारों की सूची जारी होने पर यह स्पष्ट हो गया कि टिकट वितरण एक बार फिर से पुरुष प्रधान रहा है। भाजपा ने उडुपी चिकमगलूरु से मौजूदा सांसद शोभा करंदलाजे को दोबारा उम्मीदवार बनाया है। वहीं, कांग्रेस ने बागलकोट से वीणा कशप्पानवर को जबकि जद-दस ने विजयपुर संसदीय क्षेत्र से सुनीता च्वहाण को टिकट दिया है। इन प्रमुख दलों में इनके अतिरिक्त सभी पुरुष उम्मीदवार हैं। वहीं, मंड्या लोकसभा क्षेत्र से दिवंगत एचएल अंबरीश की पत्नी सुमालता निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ रही हैं और भाजपा ने उन्हें समर्थन दिया है।

हालांकि लोकसभा चुनाव २०१४ के दौरान राज्य में २१ महिला प्रत्याशी मैदान में थी जिनमें ११ महिला उम्मीदवार कांग्रेस, जद-एस और भाजपा से थी। पिछले चुनावों में तीनों प्रमुख दलों द्वारा ११ महिलाओं को टिकट देने से उम्मीद जगी थी कि आने वाले चुनावों में महिलाओं को प्रतिनिधित्व बढेगा लेकिन इस बार सिर्फ ३ महिलाओं को प्रत्याशी बनाने से इसे जोरदार झटका लगा है।

१९९६ से अटका है महिला आरक्षण विधेयक
देश में महिलाओं को संसद और विधानसभाओं ३३ प्रतिशत आरक्षण देने की बात कई दशकों से की जा रही है। वर्ष १९९६ में पहली बार संसद में महिला आरक्षण विधेयक को पटल पर रखा गया लेकिन दो दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी राजनीतिक दलों ने महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने की इच्छा शक्ति नहीं दिखाई। इस अवधि में कांग्रेस और भाजपा दोनों की सरकारें रहीं लेकिन किसी भी दल ने विधेयक को पारित कराने की जहमत नहीं उठाई।

जिताऊ प्रत्याशियों पर दांव
चुनाव में जीत हासिल करना ही हर राजनीतिक दल का अंतिम लक्ष्य होता है। जानकारों का कहना है कि इसी कारण सिर्फ उन्हीं महिलाओं को उम्मीदवार बनाया जाता है जो जिताऊ प्रत्याशी हों। इसमें कई बार लोकप्रिय महिलाओं को टिकट दिया जाता है, जैसे मंड्या संसदीय उपचुनाव २०१४ में कांग्रेस ने फिल्म अभिनेत्री रम्या को उम्मीदवार बनाया था। इसके अतिरिक्त राजनीतिक परिवारों से आने वाली महिलाओं को ज्यादा मौका मिलता है जबकि सामान्य महिला कार्यकर्ताओं के लिए टिकट पाना बेहद कठिन रहता है।

 

Santosh kumar Pandey Desk
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