मौत के विषय में चाहत काम नहीं करती

धर्मसभा में बोले डॉ. समकित मुनि

By: Yogesh Sharma

Published: 28 Oct 2020, 05:42 PM IST

बेंगलूरु. अशोकनगर शूले में श्रमण संघीय डॉ. समकित मुनि ने भगवान महावीर निर्वाण कल्याणक के उपलक्ष्य में 21 दिवसीय उत्तरा ध्यान सूत्र के चौथे दिन पर सातवें, आठवें, नवम अध्ययन का वाचन किया। उन्होंने विवेचन करते हुए कहा धर्म तप आराधना आदि चाहने से किया भी जा सकता है और नहीं भी, लेकिन मौत के विषय में चाहत काम नहीं करती। मौत अवश्य आएगी। कब मरना है यह हमारे हाथ में नहीं, परंतु कैसे मरण को प्राप्त करना यह हमारे वश में है। पांचवें अध्ययन में सकाम और अकाम रूपी दो प्रकार का मरण बताया है। अका म मरण को जो प्राप्त होता है वह बार-बार जन्म- मरण करता है और सकाम (समाधि) मरण को पाने वाला संसार सीमित कर जाता है।
मुनि ने कहा कि जो साधु केवल वेश से संत हैं जिसका आचरण श्रेष्ठ नहीं है उनकी अपेक्षा कुछ ऐसे ग्रहस्थ श्रेष्ठ होते हैं जिनका आचरण उत्तम होता है। ऐसे ग्रहस्थ सकाम मरन को प्राप्त करते हैं। संत का वेश उसे दुर्गति से नहीं बचा सकता, बल्कि सदाचरण ही दुर्गति से बचाता है। सुंदर आचरण वाले को सकाम मरण प्राप्त होता है। अज्ञानी व्यक्ति हर ओर से पाप कर्म एकत्र करता है, जिससे अंत समय वह मौत से भयभीत होकर पश्चाताप करता है। जो उम्र भर गलत काम करते हैं। काम भोग में गीध रहते हैं वह अकाम मरण को पता है। जो धर्म का राजमार्ग त्याग कर अधर्म का साथ देता है उसे अंतिम लम्हों में ब बाणों की शैया पर सोना पड़ता है। धर्म का साथ देने वाले को सब कुछ हासिल होता है। जिनकी सोच होती है- हम अपनी मस्ती में आग लगे बस्ती में, ऐसे पाप कर्म में रत व्यक्ति को अकाम मरण मिलता है। छठे अध्ययन पर मुनि ने कहा कि जो नित्य में अनित्य की अनुभूति करता है, वह अज्ञानी कहलाता है, ऐसा अज्ञानी दुख पाता है। सत्य की खोज स्वयं करें, स्वयं पर भरोसा रखें, मेहनत से जी न चुराए। गुरु मार्ग बता सकते हैं, परंतु चलना स्वयं को पड़ेगा। मेहनत से जी चुराने वाला शरीर को रोगी बनाता है। सम्यक पुरुषार्थ ना करने वाला अपनी आत्मा को रोगी बनाता है। आत्मार्थी पाप से घृणा करता है पापी से नहीं। यह शरीर पूर्व कर्मों को निर्जरित करने के लिए मिला है।

Yogesh Sharma Reporting
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