सांसारिक सुख मृगतृष्णा के समान है-देवेंद्रसागरसूरि

जयनगर जैन मंदिर में धर्मसभा

By: Yogesh Sharma

Updated: 27 Nov 2019, 03:58 PM IST

बेंगलूरु. जयनगर जैन मंदिर में स्थिरता के दौरान आचार्य देवेंद्रसागर की निश्रा में महामांगलिक का आयोजन हुआ। महामांगलिक के बाद आचार्य ने अपने प्रवचन में कहा कि दुख में सुख और सुख के साथ दुख। सामान्यत: जीवन की सारी कहानी इन्ही दो चक्रों में सिमट कर रह जाती है। दो होना यानी द्वंद। हम मजबूत द्वंद-जाल में ही तो जकड़े हैं। मेरा-तेरा, धर्म-अधर्म, सच-झूठ, हार-जीत, हानि-लाभ, हेड-टेल, गरीबी-अमीरी, सफलता-विफलता, घृणा-प्रेम, अंधेरा-उजाला, जन्म-मृत्यु, जवानी-बुढ़ापा, ऊंच-नीच, स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन, राग-द्वेष, धरती-आकाश, अच्छा-बुरा, पाप-पुण्य, ज्ञान-अज्ञान और जीव-ईश्वर वगैरह सब द्वंद ही तो हैं। द्वंद ही संसार है और संसार में सुख मृग तृष्णा ही है। आदि या शायद अनादिकाल से मानव दुख से बचने और सुख के रास्ते ढूंढने में लगा है। आचार्य ने कहा कि न जाने कितने हजार साल पहले हमारे मंत्रदृष्टा ऋषियों ने ‘सर्वे भवन्तु सुखिन, मा कश्चिद दुख: भाग्यभवेत’ गाया होगा। आज भी कुछ धार्मिकनुमा कार्यक्रमों में यह मंत्र हम सुनते हैं। लेकिन हम कितने सुखी हो पाए और दूसरों को दु:ख रहित कर पाए, कह नहीं सकते। हम दुखों से बचने को छटपटाते रहते हैं। सुख समेटने को करणीय-अकरणीय क्या-क्या नहीं करते। पहले जीने के लिए और फिर सुख-सुविधा से जीने के लिए ही तो सारे उद्यम-उपक्रम करते हैं। सत्कार्य-सत्संग से अत्याचार-अधर्म तक। हत्या से प्रेमालिंगन तक। फिर भी सुख पकड़ में नहीं आता। मिलता भी है तो जैसे मु_ी में पानी। सुख की प्यास-अग्नि बुझती नहीं और दुख पिंड नहीं छोडते। सुख है कहां? पैसे-सम्पन्नता में, शक्ति-यौवन में, पद-अधिकारिता में, पढालिखा-विद्वान या फिर सेलेब्रिटी-वीवीआईपी वगैरह होने में? कह सकते हैं-अनिवार्यत: नहीं। ये सुख-साधन होने जैसा दृश्य तो बना सकते हैं, पर सुखी नहीं। ऐसी स्थितियों वाले अधिकांश लोग सदैव हंसते-मुस्कराते और ऐंठ-अकड़ कर चलते-बोलते दिख सकते हैं, पर उनके अंतस में सुखों का कितना सूखा है, यह वे ही जानते हैं। हम देखते हैं कि कोई कितना प्रभावशाली-महत्वपूर्ण क्यों न हो, उसके लिए दुख न आए, सदैव सुख ही रहे ऐसा किमपि संभव नहीं होता। एक छूटा, दूसरा दुख मुंह बाए खड़ा रहता है। कभी कभी लगता है सुख केवल भुलावा-भ्रम है, दुख ही होता है। बचपना है, बड़ों की स्नेह छाया है। जवानी है, मन बहलाने के ढेरों साधन हैं। दोनों स्थितियों में सुख लग सकता है, पर आगे कितने दुख-दैत्य खड़े इंतजार कर रहे हैं ,पता नहीं होता। महात्मा कबीर को न सुख मिला था और न खोजने पर कोई सुखी। तभी तो उन्होंने कहा था-जा दिन ते जिव जनमिया, कबहुं न पावा सुख डालै डालै मैं फिरा, पातै पातै दुख। सुखिया ढूंढत मैं फिरूं, सुखिया मिलै न कोय जाके आगे दुख कहूं, पहिले उठै रोय। चाहने से सुख नहीं मिलता और न चाहने से दुख जाता नहीं। कई बार प्रारंभ में जो सुखदायी लगता है वह दुख का कारण बनता है। जैसे-अति बिषय भोग,व्यसन,शराब-सिगरेट व अन्य मादक पदार्थ और अयुक्त आहार-विहार आदि। दुख या दुखों का भी अपना एक सुख होता है। दोनों यावज्जीवन लगे रहते हैं। संयोग-वियोग में, सोने-जागने में, गरीबी-अमीरी में, खाने-पीने और उसके अपशिष्ट उत्सर्जन में। दोनों महत्वपूर्ण हैं। दुख के साथ दर्द जुड़ा होता है और सुख का सजातीय आनंद है। दुख से सुख और दूसरें के दुख के महत्व का पता चलता है।

Yogesh Sharma Reporting
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