धन मांगने से मिल सकता है, सिद्धि नहीं-समकित मुनि

लोगस्स पाठ का समापन

By: Yogesh Sharma

Updated: 18 Sep 2020, 10:41 AM IST

बेंगलूरु .अशोकनगर शूले जैन स्थानक में विराजित श्रमण संघीय डॉ.समकित मुनि ने लोगस्स पाठ के समापन पर प्रवचन में कहा सिद्ध भगवान से साधक सात्विक प्रार्थना करते हुए कहता है कि मुझे भी सिद्धि प्रदान करो। मुझे ऐसा सास्वत घर प्रदान करो, जिसमें कोई बीमारी नहीं है, जहां ऐसा सुख है जिसमें दुख की मिलावट नहीं है। परमात्मा की भक्ति करते हुए यह भावना लाओ-प्रभु! मुझे झंझटो से, चिंता से, रोग शौक से पार लगा दो। घर घर आदि सब झंझट है कामना झंझट कि नहीं झंझटों से आजाद करो। जिस भावना में हम एकाकार होंगे वैसा ही हमारा स्वरूप बनेगा। धन मांगने से मिल सकता है परंतु सिद्धि मांगने से नहीं बल्कि सत पुरुषार्थ से मिलती है। सत्प्राक्रम का पहला कदम है- हम जैसा बनना चाहते हैं ऐसी भावना भाना। मुझसे नहीं होगा इस भावना को लाएंगे तो जो काम हम कर सकते थे। वह भी नहीं कर पाएंगे। भावों से हम संसारी हैं और सिद्ध बनने की कामना करते हैं तो कामना फल नहीं सकती। दान करते समय भी भाव चाहिए, शील पालने और तप करने में भी भावना चाहिए। तभी सत्कार्य सफल बनता है। मन भोग में रमन कर रहा है तो योग का मार्ग अपनाना कठिन होता है।
सती चेलना की कथा सुनाते हुए मुनि ने कहा कि जहां रिश्ते दिल के होते हैं वहां पर मन की बात कहनी नहीं पड़ती। बल्कि सामने वाला स्वयं ही समझ जाता है।अपने रिश्तों को इतनी ऊंचाइयों पर ले जाओ कि कहने सुनने की जरूरत ना पड़े। जिन रिश्तों में दिल से जुड़ाव होता है। वहां शब्दों से कहने की आवश्यकता नहीं होती। हम दूसरों के दिल की भाषा तभी समझते हैं जब हम रिश्तो को दिल से निभाते हैं। दिमाग के रिश्ते तर्क के द्वारा आगे बढ़ते हैं और दूसरों को शब्दों के जाल में उलझाते हैं। मुनि ने आह्वान किया कि कल आचार्य शिव मुनि के जन्मदिवस को अधिक से अधिक तप, जप, ध्यान, साधना के साथ मनाएं। इस दिन एकासन तप एवं दो-दो सामायिक करने का लक्ष्य रखें ऐसी भावना व्यक्त की। प्रेम कुमार कोठारी ने बताया कि संचालन संघ के मंत्री मनोहर लाल बंब ने किया।

Yogesh Sharma Reporting
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