राजस्थान की राजनीति में रहा बांसवाड़ा का बड़ा दखल, 10 बार विधायक और 3 बार मुख्यमंत्री बने हरिदेव जोशी

Banswara Political News, Rajasthan Politics News, Rajasthan MLAs News, CM Ashok Gehlot, Sachin Pilot : राजस्थान में इन दिनों सियासी घमासान के बीच सुर्खियों में बांसवाड़ा

By: mradul Kumar purohit

Published: 13 Jul 2020, 11:56 AM IST

बांसवाड़ा. प्रदेश में इन दिनों कांगे्रस सरकार को लेकर सियासी घमासान मचा है। जिले के बागीदौरा और कुशलगढ़ विधायक से कथित रूप से संपर्क करने की बातचीत के बाद बांसवाड़ा भी सुर्खियों में है। प्रदेश की राजनीति में बांसवाड़ा का पूर्व में भी बड़ा दखल रहा है। कई सियासी घटनाक्रमों के बीच हरिदेव जोशी ने प्रदेश की कमान संभाली थी। प्रदेश में लगातार दस चुनाव जीतने का रिकार्ड बनाने वाले जोशी पहला चुनाव डूंगरपुर से 1952 में लड़े, लेकिन पहली बार उन्हें मंत्री पद 1965 में मोहनलाल सुखाडिय़ा की सरकार में मिला। इसके बाद 1971 में बरकतुल्लाह की केबिनेट में भी जोशी मंत्री बने।

... और जोशी का हुआ चयन
बरकतुल्लाह के निधन के बाद 1973 में हरिदेव जोशी को कार्यवाहक मुख्यमंत्री बनाया गया। हालांकि मुख्यमंत्री का चयन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को करना था। बताते हैं कि इंदिरा गांधी की पहली पसंद रामनिवास मिर्धा थे। वहीं कई विधायक हरिदेव जोशी के पक्ष में थे। ऐसे में विधायक दल की वोटिंग हुई, जिसमें जोशी ने मिर्धा से 13 वोट अधिक हासिल किए और पहली बार जनजाति इलाके का व्यक्ति मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा। इसके साथ ही प्रदेश की राजनीति में बांसवाड़ा की पहचान स्थापित होती गई। जोशी ने संजय गांधी के पांच सूत्री कार्यक्रम को भी लागू करने में रुचि दिखाई। कई विपक्षी विधायकों को कांगे्रस में शामिल किया।

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राजीव ने बनाया सीएम
जनता लहर के बाद 1980 के चुनाव में कांगे्रस दोबारा सत्ता में लौटी। पहले जगन्नाथ पहाडिय़ा, फिर शिवचरण माथुर सीएम बने। माथुर को एक एनकांउटर के बाद इस्तीफा देना पड़ा तो हीरालाल देवपुरा को कार्यवाहक सीएम बनाया। इसके बाद चुनाव हुए तो हरिदेव जोशी को राजीव गांधी ने मुख्यमंत्री बना दिया। इसे लेकर कांगे्रस के आला नेताओं ने नाराजगी भी जताई। 1986 में राजीव गांधी की रणथंभौर यात्रा के दौरान हरिदेव जोशी एक नेता के कहने पर नहीं पहुंचे तो गांधी नाराज हो गए। जानकारी पर जोशी दिल्ली पहुंचे और पूरी कहानी बताई तब गांधी की नाराजगी दूर हुई। इसके बाद गांधी की सरिस्का यात्रा के दौरान कोई बड़ा तामझाम नहीं करना था, लेकिन तामझाम को देखकर वे नाराज हुए। बाद में उनके कहने पर जोशी ने जनवरी 1988 में पद से त्यागपत्र दे दिया।

गुवाहाटी से सीधे जयपुर
जोशी का प्रदेश की राजनीति में इतना अधिक रूतबा था कि 1989 के लोकसभा चुनाव में कांगे्रस को नुकसान उठाना पड़ा और चार महीने बाद विधानसभा चुनाव था। माथुर के मुख्यमंत्री बनने के बाद जोशी को असम का राज्यपाल बनाया था, लेकिन विधानसभा चुनाव को देखते हुए जोशी को गुवाहाटी से जयपुर बुलाया गया। वे विधायक दल के नेता चुने गए और चार दिसंबर 1989 को तीसरी बार सीएम की शपथ ली। 93 के चुनाव के बाद भी उन्हें विधायक दल का नेता चुना गया था। हालांकि सरकार भाजपा की बनी और बाद में 28 मार्च 1995 को जोशी का निधन हो गया। आज जोशी नहीं हैं, लेकिन जिले और प्रदेश की राजनीति में उनके रूतबे और दखल की चर्चाएं अब भी होती हैं।

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