बांसवाड़ा : मित्रता तो कृष्ण सुदामा जैसी हो, जिसमें कहीं भी ऊंच-नीच का भाव न हो

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By: Ashish vajpayee

Published: 24 Jul 2018, 04:22 PM IST

बांसवाड़ा. लालीवाव मठ में गुरु पूर्णिमा महामहोत्सव के तहत महामण्डलेश्वर हरिओमदास महाराज के सान्निध्य में चली रही ‘नानी बाई रो मायरो’ कथा में साध्वी जयमाला दीदी वैष्णव ने कहा कि मित्रता करनी हो तो कृष्ण-सुदामा जैसी करनी चाहिए। चक्रवर्ती सम्राट होने के बावजूद श्रीकृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को भुलाया नहीं। उनकी मित्रता में कहीं भी ऊंच-नीच का भाव नहीं था। श्री कृष्ण ने सुदामा के साथ अंत तक मित्रता निभाई ।

थाली भर ल्याई रे खीचड़ो
कथा के दौरान जयमाला दीदी के ‘भक्त के वश में है भगवान...’, ‘थाली भर के ल्याई रे खीचड़ो...’, ‘ऊपर घी की बाटकी...’ और सारे जग का है वो रखवाला, मेरा भोला है सबसे निराला...’ भजनों पर श्रद्धालु झूम उठे और नृत्य करने लगे।

बेटियों को पढ़ाएं
जयमाला दीदी ने भगवान की नि:स्वार्थ भक्ति करने की बात कही। समाज को सामाजिक व्यवस्था के सुधार के लिए बेटियों की शिक्षा पर जोर देने का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि समाज में बेटियों की अहम भूमिका है। उनका मान, सम्मान और शिक्षा पर हमें ध्यान देना चाहिए। मनुष्य जीवन परमात्मा द्वारा दिया उपकार है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन को प्रभु के चरणों में अर्पण कर दे। सुख में अहंकार नहीं करना व दुख में कभी हताश न होना ही सुखद जीवन का मूल मंत्र है। प्रभु सुमिरन में वह आनन्द समाया है, जिसकी अनुभूति परमात्मा के गुणगान से ही हो सकती है।

संचालक डा. दीपक द्विवेदी ने बताया कि पार्थेश्वर महापूजा एवं रुद्राभिषेक पूजन आचार्य इच्छाशंकर, समरत मेहता, दिनेश द्विवेदी, घनश्याम मनासा, घनश्याम जोशी टीम के आचार्यत्व में महेश राणा परिवार ने किया। लालीवाव मठ के शिष्यों ने विधिविधान के साथ पार्थिव शिवलिंग से चन्द्र यंत्र बनाकर उनका पूजन किया । प्रारम्भ में माल्यार्पण गोपालसिंह, सुभाष अग्रवाल, सुखलाल सोलंकी, ईश्वरी देवी वैष्णव, डा. विश्वास, हर्ष राठौड़, लालीबाई आदि ने किया। इसके बाद व्यासपीठ एवं पार्थिव शिवजी की आरती की गई।

श्रद्धापूर्वक मनाई देवशयनी एकादशी
बांसवाड़ा. जिले में देवशयनी एकादशी श्रद्धाभाव से मनाई गई। आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी को मनोकामना पूर्ति की एकादशी भी कहा जाता है। इस अवसर पर मंदिरों में विशेष अनुष्ठान किए गए। इसके साथ ही चार माह के लिए अब मांगलिक और वैवाहिक आयोजनों पर विराम लग गया। अब कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी देवप्रबोधनी तक भगवान विष्णु क्षीरसागर में निद्रावस्था में रहेंगे। देवताओं के निद्रा में रहने के कारण कोई भी शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं।

 

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